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Army AI Warfare : युद्ध के मैदान में अब 'दिमाग' नहीं 'AI' लड़ेगा? प्रयागराज में सेना ने बुना चीन-पाक को मात देने का डिजिटल जाल

प्रयागराज में 'नॉर्थ टेक सिम्पोजियम' का आगाज, चीन-पाक सीमा पर तैनात दो कमानों ने रक्षा क्षेत्र की 87 जरूरतों को स्वदेशी उद्योग के साथ किया साझा, आत्मघाती ड्रोन और रोबोटिक्स से बदल जाएगा युद्ध का अंदाज

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Army AI Warfare : आधुनिक युद्ध का चेहरा पूरी तरह बदल चुका है। अब जीत केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि किस सेना के पास कितने सैनिक हैं, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि किस सेना के पास कितनी बेहतर 'तकनीक' है। रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों के हालिया संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में 'सॉफ्टवेयर' और 'सेंसर' ही असली योद्धा होंगे। इसी दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए भारतीय सेना ने अपनी युद्धक क्षमता को डिजिटल और ऑटोमैटिक बनाने के लिए एक व्यापक अभियान शुरू किया है।

प्रयागराज में सोमवार से शुरू हो रहा तीन दिवसीय 'नॉर्थ टेक सिम्पोजियम' (North Tech Symposium) इसी अभियान का शक्ति केंद्र है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इस ऐतिहासिक सम्मेलन का उद्घाटन कर रहे हैं। यहाँ सेना की दो सबसे महत्वपूर्ण कमानों—उत्तरी और मध्य कमान—ने घरेलू रक्षा उद्योग के साथ मिलकर एक ऐसा 'डिजिटल जाल' बुनने की तैयारी की है, जो चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर भारत की सुरक्षा को अभेद्य बना देगा।

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प्रयागराज में महामंथन: 284 वेंडर और 87 बड़ी चुनौतियां

इस सिम्पोजियम का आयोजन उधमपुर स्थित उत्तरी कमान और लखनऊ स्थित मध्य कमान द्वारा 'सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स' (SIDM) के सहयोग से किया जा रहा है। रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इस आयोजन में देश के 284 रक्षा वेंडर हिस्सा ले रहे हैं।

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सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सेना ने अपनी कमियों को छिपाने के बजाय उन्हें हल करने के लिए उद्योग जगत के सामने रखा है। सेना की आठ विशेष टीमों ने जमीनी स्तर पर तकनीकी अंतराल (Tech Gaps) का आकलन किया और 87 ऐसी विशिष्ट आवश्यकताओं की सूची तैयार की है, जिनके समाधान की जरूरत है। घरेलू उद्योग इन चुनौतियों के लिए अपने नवाचार और स्वदेशी समाधान पेश करेंगे। इसमें आधुनिक संघर्षों से मिली सीख को भी शामिल किया गया है।

'कामिकेज़' ड्रोन और 'स्वार्म' तकनीक: दुश्मन के लिए नया काल

युद्ध के मैदान में ड्रोन अब केवल निगरानी का जरिया नहीं रहे, बल्कि वे खुद एक घातक हथियार बन चुके हैं। सेना ने इस सिम्पोजियम में विशेष रूप से 'ड्रोन युद्ध' पर फोकस किया है। उद्योग जगत से जिन प्रणालियों की मांग की गई है, वे दुश्मन के होश उड़ाने के लिए काफी हैं:

  • कामिकेज़ ड्रोन (Kamikaze Systems): ये 'सुसाइड ड्रोन' कहलाते हैं। ये दुश्मन के ठिकानों पर जाकर खुद को ब्लास्ट कर देते हैं, जिससे सटीक और भारी नुकसान होता है।

  • टैंक-रोधी लोइटरिंग मूनिशन: ऐसे ड्रोन जो आसमान में तब तक मंडराते रहते हैं जब तक उन्हें दुश्मन का टैंक या बख्तरबंद गाड़ी नजर न आ जाए।

  • पेनेट्रेटिंग रडार ड्रोन: सेना को ऐसे ड्रोन चाहिए जो पेड़ों के पार देख सकें और घने जंगलों में छिपे हुए बंकरों का सटीक पता लगा सकें।

  • हाई-एल्टीट्यूड और सैटेलाइट संचार: लद्दाख और हिमाचल जैसे अधिक ऊंचाई वाले इलाकों में संचार बड़ी चुनौती होती है। यहाँ सेना को ऐसे ड्रोन चाहिए जो सैटेलाइट से जुड़कर लंबी दूरी तक काम कर सकें।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) : जब एल्गोरिदम बनेगा कमांडर

इस सिम्पोजियम का सबसे रोमांचक हिस्सा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का उपयोग है। सेना अब दुश्मन की हर हरकत को रीयल-टाइम में डिकोड करना चाहती है। इसके लिए कुछ खास तकनीकों पर काम हो रहा है:

  1. अनुवाद और डिकोडिंग: दुश्मन की ओर से इंटरसेप्ट किए गए गुप्त संदेशों को AI की मदद से तुरंत अपनी भाषा में समझना और रीयल-टाइम अनुवाद करना।
  2. ड्रोन थ्रेट डिटेक्शन: दुश्मन के ड्रोन के हमले से पहले ही AI सिस्टम उसे पहचान लेगा और उसे बेअसर करने के लिए काउंटर-ड्रोन इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर शुरू कर देगा।
  3. कैमफ्लाज डिटेक्शन: दुश्मन अक्सर घास या बनावटी जाल बिछाकर अपने हथियारों को छिपाता है। AI सिस्टम अब इन छिपे हुए ठिकानों की पहचान करने में सक्षम होंगे।
  4. स्वायत्त सिग्नल सेंसर: ऐसे सेंसर जो इंसानी दखल के बिना दुश्मन के रडार और संचार संकेतों को पकड़ सकेंगे।

ग्राउंड रोबोटिक्स : सैनिकों की जान बचाने का 'कवच'

खतरनाक ऑपरेशनों में सैनिकों के जोखिम को कम करने के लिए सेना अब रोबोटिक्स को मोर्चे पर तैनात करने वाली है। इसके तहत सेना ने उद्योग जगत से एरियल और ग्राउंड रोबोटिक मिशन सिस्टम मांगे हैं।

इसमें सबसे अहम वे रोबोट हैं जो 'असॉल्ट राइफल' से लैस होंगे। ये रोबोट किसी भी आतंकवादी ठिकाने या मुश्किल बंकर में घुसकर फायरिंग कर सकते हैं, जिससे हमारे सैनिकों की जान जोखिम में नहीं पड़ेगी। इसके अलावा, दुर्गम पहाड़ी इलाकों में रास्ता बनाने या मलबे को हटाने के लिए अब रिमोट से चलने वाले 'ऑल-टेरेन डोजर्स' का उपयोग किया जाएगा।

गौरतलब है कि भारतीय सेना की उत्तरी कमान जहाँ जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में पाकिस्तान व चीन की चुनौतियों से जूझती है, वहीं मध्य कमान हिमाचल और उत्तराखंड में चीन की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) की सुरक्षा करती है। यह सिम्पोजियम सेना, वैज्ञानिकों और उद्यमियों के बीच एक मजबूत सेतु का काम करेगा, जिससे 'आत्मनिर्भर भारत' का सपना रक्षा क्षेत्र में सच हो सकेगा।

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