Armed Robotic Dog : असॉल्ट राइफल से लैस रोबोटिक डॉग क्या करेगा? युद्ध अभ्यास में कैसे बदलेगी शहरी लड़ाई की तैयारी
औली में इमारतों की तलाशी और कमरों में प्रवेश का अभ्यास; नैनो-ड्रोन और स्नाइपर के साथ मानवरहित तकनीक का इस्तेमाल, सैनिकों का जोखिम घटाने पर जोर
Armed Robotic Dog : शहरी इलाकों में इमारतों की तलाशी लेना और कमरों में प्रवेश कर कार्रवाई करना सैन्य अभियानों का जोखिम भरा हिस्सा होता है। ऐसे अभियानों में भारतीय और अमेरिकी सैनिकों के साथ अब रोबोटिक डॉग और नैनो-ड्रोन का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। उत्तराखंड के औली में चल रहे संयुक्त सैन्य अभ्यास ‘युद्ध अभ्यास’ के दौरान मानवरहित तकनीक और विशेष सैन्य टुकड़ियों के बीच तालमेल का अभ्यास किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सैन्य क्षमता बढ़ाने के साथ सैनिकों का जोखिम कम करना है।
रोबोटिक डॉग में क्या है खास ?
अभ्यास स्थल से सामने आए दृश्यों में असॉल्ट राइफल और विभिन्न सेंसर से लैस एक रोबोटिक डॉग दिखाई दे रहा है। इसका इस्तेमाल ऐसी कुछ सैन्य गतिविधियों के अभ्यास में किया जा रहा है, जिन्हें सामान्य तौर पर सैनिक खुद अंजाम देते हैं।
इस अभ्यास में रोबोटिक डॉग, नैनो-ड्रोन और स्नाइपर के बीच समन्वय पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य शहरी और इमारतों से घिरे इलाकों में सैन्य कार्रवाई के दौरान मानवरहित प्रणालियों की भूमिका को परखना है।
इस तकनीक से क्या फायदा हो सकता है?
- निगरानी और टोही की क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
- इमारतों और सीमित जगहों में अभियान के दौरान सैनिकों को तकनीकी सहायता मिल सकती है।
- नजदीकी लड़ाई और शहरी अभियानों में सैन्य क्षमता और लचीलेपन को बढ़ाया जा सकता है।
- जोखिम भरे अभियानों में सैनिकों के सीधे खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में रोबोटिक डॉग की स्वायत्तता, हथियार संचालन की प्रक्रिया और उसकी तकनीकी क्षमताओं का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है।
युद्ध अभ्यास 2026: कब और कहां हो रहा है?
भारत और अमेरिका के बीच आयोजित होने वाले सालाना संयुक्त सैन्य अभ्यास का यह 22वां संस्करण है। इसकी शुरुआत 15 सितंबर को हुई। यह अभ्यास भारत और अमेरिका में बारी-बारी से आयोजित किया जाता है।
इस बार प्रशिक्षण के अलग-अलग हिस्से उत्तराखंड के औली और राजस्थान के महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में एक साथ चल रहे हैं।
अभ्यास का उद्देश्य दोनों सेनाओं की संयुक्त सैन्य क्षमता बढ़ाना है। इसमें पहाड़ी और अर्ध-पहाड़ी क्षेत्रों में एकीकृत युद्ध समूहों (Integrated Battle Groups) के इस्तेमाल पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। पैदल सेना पर आधारित अभियानों का प्रशिक्षण भी इसका हिस्सा है।
पहाड़ी अभियानों में तालमेल पर जोर
अभ्यास के दौरान दोनों सेनाएं अपनी रणनीतियों, तकनीकों और सैन्य प्रक्रियाओं को साझा करेंगी। संयुक्त योजना तैयार करने और उसे जमीन पर लागू करने की क्षमता को मजबूत करना भी इसका उद्देश्य है।
अलग-अलग भूभाग और परिचालन परिस्थितियों में संयुक्त अभियान चलाने के लिए आपसी तालमेल जरूरी है। इस प्रशिक्षण के जरिए दोनों सेनाओं को अपने अनुभव साझा करने और साथ मिलकर काम करने की प्रक्रियाओं को बेहतर बनाने का अवसर मिलेगा।
ड्रोन और स्वायत्त प्रणालियां क्यों हैं अहम?
युद्ध अभ्यास में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल एक प्रमुख क्षेत्र है। प्रशिक्षण में निगरानी और टोही के लिए ड्रोन तथा स्वायत्त प्रणालियों को शामिल किया गया है। महाजन फील्ड फायरिंग रेंज में आधुनिक हथियार प्रणालियों का प्रदर्शन भी किया जाएगा। इसके अलावा, दोनों सेनाओं के विषय विशेषज्ञ उभरती तकनीकों और बहु-क्षेत्रीय युद्ध (Multi-domain Warfare) में हो रहे बदलावों पर विचारों का आदान-प्रदान करेंगे।
बहु-क्षेत्रीय युद्ध में विभिन्न सैन्य क्षेत्रों के बीच समन्वय महत्वपूर्ण होता है। इस अभ्यास के जरिए दोनों सेनाओं को तकनीकी बदलावों को समझने और अलग-अलग परिस्थितियों में संयुक्त अभियान की तैयारी करने का अवसर मिलेगा।
सैनिकों का जोखिम कम करने पर जोर
अभ्यास में मानवरहित प्रणालियों को सैन्य क्षमता बढ़ाने वाले साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इनका उद्देश्य नजदीकी लड़ाई और शहरी वातावरण में सैनिकों को अतिरिक्त सहायता देना और अभियान के दौरान उनके जोखिम को कम करना है।

