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Aravali Hills: अरावली ने दो दशकों में कैसे खो दिए 120 जलस्रोत

Aravali Hills: ग्रीन वॉल परियोजना के तहत चल रहे अरावली सर्वेक्षण में गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जिलों में जलभृतों (एक्विफर) और जलस्रोतों के बड़े पैमाने पर नुकसान जैसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसके लिए शुरुआती 2000 के...

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फाइल फोटो।
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Aravali Hills: ग्रीन वॉल परियोजना के तहत चल रहे अरावली सर्वेक्षण में गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जिलों में जलभृतों (एक्विफर) और जलस्रोतों के बड़े पैमाने पर नुकसान जैसे कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। इसके लिए शुरुआती 2000 के दशक तक वैध रही खनन गतिविधियां, उसके बाद कथित तौर पर जारी अवैध खनन और पहाड़ियों का बढ़ता कंक्रीटीकरण जिम्मेदार माना जा रहा है। इन कारणों से तीनों जिलों में अरावली की प्राकृतिक जल प्रणाली (एक्वा नेटवर्क) लगभग नष्ट हो गई।

मुख्य चिंता क्या है?

हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, शुरुआती 2000 के दशक तक कानूनी खनन, उसके बाद बेलगाम अवैध खनन और बिना रोक-टोक निर्माण गतिविधियों ने अरावली की जल प्रणाली को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है। हालांकि खनन से बने गड्ढों में पानी भर गया, लेकिन इसके चलते मूल झीलें, तालाब, जलभृत और प्राकृतिक जल निकासी तंत्र नष्ट हो गए। सर्वे में बताया गया है कि पिछले दो दशकों में कम से कम 120 जलस्रोत, जिनमें तालाब, झीलें और झरने शामिल हैं सूख चुके हैं।

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राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में वन विभाग द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार, अरावली क्षेत्र में प्राकृतिक और मानव-निर्मित जलस्रोतों की संख्या 30 साल से भी कम समय में 265 से घटकर 50 से नीचे आ गई है। साथ ही, करीब 500 एकड़ वन भूमि विकास की भेंट चढ़ चुकी है।

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किन नदियों और जलस्रोतों पर असर पड़ा?

अरावली से निकलने वाली प्रमुख नदियां बाणास, लूनी, साहिबी और साखी—अब गंभीर रूप से सिकुड़ चुकी हैं या लगभग “मृत” स्थिति में पहुंच गई हैं, जिसका मुख्य कारण भूजल प्रवाह का बाधित होना है।

फरीदाबाद में बदखल झील, पीकॉक लेक, सूरजकुंड तालाब, सूरजकुंड क्षेत्र के कई झरने पूरी तरह खत्म हो चुके हैं। नूंह में फिरोजपुर झिरका के 20 से अधिक झरने, कोटला मुबारकपुर और तावड़ू के झरने अब बहना बंद कर चुके हैं।

इसी तरह गुरुग्राम में सोहना की दमदमा झील, भोंडसी के तीन झरने, रायसीना पहाड़ियों के प्राकृतिक जलस्रोत बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।

खनन से इतना दीर्घकालिक नुकसान क्यों हुआ?

गहरे खनन से जलभृतों में छेद हो जाते हैं, भूमिगत जल धाराएं टूट जाती हैं और कई इलाकों में भूजल स्तर 1,000 से 2,000 फीट तक नीचे चला गया है। इसके अलावा, कैचमेंट क्षेत्रों और वर्षा जल निकासी नालों पर निर्माण ने प्राकृतिक जल निकासी प्रणाली को बदल दिया, जिससे एनसीआर और राजस्थान के कुछ हिस्सों तक जल उपलब्धता प्रभावित हुई है।

पर्यावरणविद क्या मांग कर रहे हैं?

स्थानीय पर्यावरणविद अरावली क्षेत्र, खासकर गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह में गायब हो चुके 120 से अधिक जलभृतों और जलस्रोतों के पुनर्जीवन के लिए विशेष योजना की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि इन प्राकृतिक प्रणालियों के नष्ट होने से यह क्षेत्र जल संकट और अचानक आने वाली बाढ़ (फ्लैश फ्लड) के प्रति अत्यंत संवेदनशील हो गया है। पर्यावरणविदों का तर्क है कि गुरुग्राम में जलभराव की समस्या भौगोलिक संरचना के कारण नहीं, बल्कि अरावली की प्राकृतिक जल-संचयन क्षमता के खत्म होने के कारण है।

सरकार क्या कर रही है?

गुरुग्राम प्रशासन और गुरुजल प्राधिकरण दमदमा झील के पुनर्जीवन पर काम कर रहे हैं। यह झील मानसून के दौरान भर जाती है, लेकिन अत्यधिक रिसाव के कारण इसका जल क्षेत्र 80 एकड़ से घटकर एक महीने के भीतर लगभग 35 एकड़ रह जाता है।

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