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Explainer: PGI चंडीगढ़ में 2005 पद खाली, मरीजों की भीड़ के बीच सिस्टम दबाव में?

PGI Chandigarh: 131 फैकल्टी और 1,874 गैर-फैकल्टी पद हैं रिक्त

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PGI Chandigarh: उत्तर भारत के सबसे बड़े तृतीयक चिकित्सा संस्थानों में गिने जाने वाले पीजीआई चंडीगढ़ (Postgraduate Institute of Medical Education and Research) में स्टाफ की भारी कमी सामने आई है। लोकसभा में सरकार द्वारा दिए गए आधिकारिक जवाब के अनुसार संस्थान में 131 फैकल्टी और 1,874 गैर-फैकल्टी (नॉन-टीचिंग) पद रिक्त हैं। यानी कुल 2005 पद रिक्त हैं।

आंकड़ों के मुताबिक, कुल 732 स्वीकृत फैकल्टी पदों में से 601 कार्यरत हैं, जबकि 8,265 गैर-फैकल्टी पदों में से 1,874 खाली हैं। इनमें अटेंडेंट के 328 पद रिक्त बताए गए हैं। पीजीआई चंडीगढ़ हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और यहां तक कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों से आने वाले मरीजों का प्रमुख रेफरल सेंटर है। रोजाना हजारों मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं।

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आंकड़ों में समझें पूरी तस्वीर

फैकल्टी पद

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  • कुल स्वीकृत: 732
  • कार्यरत: 601
  • रिक्त: 131
  • यानी लगभग 18 प्रतिशत फैकल्टी पद खाली हैं।

गैर-फैकल्टी पद

  • कुल स्वीकृत: 8,265
  • रिक्त: 1,874

अस्पताल अटेंडेंट

  • स्वीकृत: 519
  • कार्यरत: 191
  • रिक्त: 328

अस्पताल अटेंडेंट के मामले में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। इसमें लगभग दो-तिहाई पद खाली।

फैकल्टी की कमी क्यों गंभीर है

फैकल्टी में प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर शामिल होते हैं। इनकी भूमिका केवल मरीज देखना नहीं है। वे जटिल सर्जरी करते हैं, सुपर-स्पेशियलिटी केस संभालते हैं, जूनियर डॉक्टरों और रेजिडेंट्स को प्रशिक्षण देते हैं, शोध परियोजनाएं संचालित करते हैं और नई उपचार पद्धतियों का विकास करते हैं। 131 पद खाली होने का अर्थ है कि कई विभागों में कार्यरत डॉक्टरों पर अतिरिक्त बोझ है।

संभावित असर

  • ओपीडी में परामर्श समय कम होना
  • सर्जरी की तारीखें आगे खिसकना
  • अकादमिक गतिविधियों में दबाव
  • शोध परियोजनाओं की गति धीमी होना

रोज 10,000 से ज्यादा मरीज ओपीडी में पहुंच रहे

पीजीआई में प्रतिदिन 10,000 से अधिक मरीज ओपीडी में आते हैं। इसके अलावा सैकड़ों मरीज भर्ती हैं। गंभीर ट्रॉमा और आपात मामले भी आते हैं। अंग प्रत्यारोपण जैसी जटिल प्रक्रियाएं भी पीजीआई में होती हैं। इतने बड़ी संख्या में मरीजों के आने के कारण स्टाफ की कमी से परेशानी आती है।

गैर-फैकल्टी में तकनीकी स्टाफ भी शामिल

1,874 नॉन-टीचिंग पद खाली होना केवल प्रशासनिक कमी नहीं है। इन पदों में लैब टेक्नीशियन, रेडियोग्राफी स्टाफ, वार्ड सहायकों, प्रशासनिक कर्मचारी और तकनीकी स्टाफ शामिल हैं। इनकी कमी से जांच रिपोर्ट में देरी, वार्ड प्रबंधन प्रभावित होता है।

अस्पताल अटेंडेंट की कमी चिंताजनक

अस्पताल अटेंडेंट के 519 में से 328 पद खाली हैं। अस्पताल अटेंडेंट ही मरीजों को वार्ड से जांच कक्ष तक ले जाते हैं। आपात स्थिति में सहायता करते हैं और बुनियादी देखभाल में मदद करते हैं। जब दो-तिहाई पद खाली हों तो परिजनों पर जिम्मेदारी बढ़ती है। वार्ड में कार्यप्रवाह बाधित होता है। नर्सिंग स्टाफ पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है।

क्या पड़ रहा असर

  • यदि रिक्तियां लंबे समय तक बनी रहीं तो मरीजों की प्रतीक्षा अवधि बढ़ेगी
  • शोध कार्य प्रभावित होंगे
  • मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा
  • निजी अस्पतालों पर निर्भरता बढ़ सकती है

संभावित समाधान

  • लंबित चयन प्रक्रियाओं को समयबद्ध किया जाए
  • विभागवार प्राथमिकता तय की जाए
  • अस्थायी नियुक्तियों पर विचार किया जाए
  • भविष्य की जरूरतों के अनुसार अतिरिक्त पद सृजित हों
  • डिजिटल प्रबंधन से दक्षता बढ़ाई जाए
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