अक्सर भारतीय समाज में उदाहरण दिया जाता रहा है कि बेटे भले ही बुढ़ापे में मां-बाप की अनदेखी कर दें, लेकिन बेटियां हर मुश्किल वक्त में मां-बाप के साथ खड़ी होती हैं। वे संवेदनशील होती हैं। रिश्तों की कद्र करना जानती हैं। लेकिन सोनीपत के एक वृद्धाश्रम में रहने वाले एक हारे हुए कारोबारी, जीवन के बाद भी अपनों की बेरुखी से हार गये। जिन तीन बेटियों को नाजों से पाला, खूब पढ़ाया-लिखाया और धूमधाम से शादी की, उनमें से कोई भी पिता की चिता को अग्नि देने नहीं आई। वृद्धाश्रम के कर्ता-धर्ताओं के सबल आग्रह के बावजूद कोई बेटी आने को तैयार न हुई। एक बेटी तो नेपाल में थी लेकिन दूसरी आजमगढ़ और तीसरी मुंबई में थी। एक बेटी ने ऑनलाइन कुछ पैसे अंतिम संस्कार के लिये भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। जबकि बाकी ने आने में असमर्थता जता दी। हां, मुंबई वाली बेटी ने अंतिम संस्कार का वीडियो जल्दी से भेजने को जरूर कहा। घटनाक्रम का दुखांत यह भी है कि बेटियों ने तेरहवीं तक में आने से इनकार कर दिया। वक्त का चक्र देखिए कि कभी मुंबई में करोड़ों का कारोबार करने वाले कारोबारी की अंतिम यात्रा के वक्त कोई अपना साथ न था। कारोबार में घाटे के बाद अपनों ने मुंह फेर लिया। कुछ समय पहले वृद्धाश्रम में रह रही पत्नी भी साथ छोड़ गई। आज हम तमाम समृद्धि व सुख-सुविधाएं जुटाने की होड़ में लगे रहते हैं, लेकिन लगातार रिश्तों की पूंजी गंवाते जा रहे हैं। कोरोना काल में तमाम खून के रिश्तों की त्रासदी तब भी उजागर हुई थी, जब संक्रमण से पीड़ित माता-पिता से खून के रिश्ते भी दूर हो गए थे। यह हमारे समय की त्रासदी है कि तमाम सुख-सुविधाओं में पले बच्चे मुश्किल वक्त में जीवन देने वाले मां-बाप को त्रासदपूर्ण स्थितियों में अकेला छोड़ देते हैं। वहीं यह हमारे समाजविज्ञानियों के लिये गहन आत्ममंथन का विषय है कि क्यों नई पीढ़ी हमारे सनातन जीवन मूल्यों से विमुख होती जा रही है।
एक समय था कि पूरी दुनिया में भारत के संयुक्त परिवारों की मिसाल दी जाती थी। पुरानी पीढ़ी भले ही अभावों में पली हो, पिता चाहे व्यवहार में कितने भी सख्त रहे हों, लेकिन बच्चों ने बुढ़ापे की लाठी बनकर अपने तमाम दायित्वों को ईमानदारी से निभाया। दरअसल, संयुक्त परिवार हमें कष्ट सहने, सामंजस्य बनाने और दूसरों के सुख-दुख में शामिल होने का संदेश भी देता था। जीवन के हर क्षेत्र में एक अनुशासन की जरूरत होती है। परिवार में भी यदि मुखिया का अनुशासन कायम न रहे तो बच्चे स्वच्छंद व्यवहार करने लगते हैं। वे आत्मकेंद्रित हो जाते हैं। लेकिन आज हमारे समाज में पश्चिमी संस्कृति ने इतनी गहराई से जड़ें जमा ली हैं कि परिवार संस्था को लेकर हम संवेदनहीन होते चले गये। हम सड़क पर घायल पड़े व्यक्ति को नजरअंदाज करके आगे बढ़ जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि सोनीपत की घटना पूरे समाज का सत्य है। यह महज एक घटना है। लेकिन मौजूदा समय के सत्य से अवगत कराती है कि समाज किस दिशा में जा रहा है। ऐसा नहीं है कि जिन बेटियों ने तमाम संसाधन व घर परिवार के होते हुए भी मां-बाप को वृद्धाश्रम जाने को बाध्य किया, वे अपने जीवन में ऐसी परिस्थितियों से दो-चार नहीं हो सकती। यह घटना सोशल मीडिया में इतनी वायरल हुई कि बेटियां शर्मसार जरूर हुई हैं। एक बेटी को तो समाज में मिट्टी पलीद होने से इतना झटका लगा कि दावा किया जा रहा है कि उसे अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। निश्चित रूप से भारतीय जीवन-दर्शन कर्मफल के सिद्धांत का अनुसरण करता रहा है। अपने कृत्यों का फल हमें अवश्य भोगना पड़ता है। जो हम कर रहे हैं,आने वाली पीढ़ियां हमें वही लौटाएंगी। बहरहाल समाज में संवेदनाओं का क्षरण एक गंभीर चुनौती है। अभिभावकों, शिक्षकों और समाजविज्ञानियों को मंथन करना होगा कि हमारे शाश्वत जीवन मूल्य कैसे बचाए जाएं। आज वृद्धाश्रमों को लाचारी नहीं जीवंतता का प्रतीक बनाने की जरूरत है। जहां व्यक्ति अपनी जमापूंजी से अपने बुढ़ापे और अंतिम यात्रा की व्यवस्था को सुनियोजित ढंग से अंतिम रूप दे सके।

