यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि कार्यपालिका की लचर कार्यशैली के चलते गाहे-बगाहे न्यायालय को उन मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता है, जिनका दायित्व निभाना सरकारों का काम है। वैसे कहने को तो पूरे देश में महिलाओं व बच्चों की सुरक्षा के लिये तमाम कायदे-कानून बनाए गए हैं। लेकिन जब इन कानूनों व योजनाओं को हकीकत में अमलीजामा पहनाने की बात सामने आती है तो जवाबदेही का अंतर साफ नजर आता है। हाल के दिनों में दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में महिलाओं के साथ हुए दुष्कर्म के मामलों पर स्वत: संज्ञान लेकर शीर्ष अदालत ने इस कड़वी हकीकत को उजागर कर दिया। इन मामलों में शीर्ष अदालत ने सिर्फ यही नहीं पूछा कि ये संगीन अपराध क्यों हुए, बल्कि यह भी जानना चाहा कि इन अपराधों को रोकने के लिये बनाया गया सिस्टम क्या हकीकत में कुछ काम करता है? कोर्ट का सवाल था कि क्या वास्तव में आपातकाल में मदद करने वाली हेल्पलाइन तुरंत जवाब देती है? क्या सीसीटीवी कैमरे पूरी मुस्तैदी के साथ काम कर रहे हैं? क्या महिलाओं के लिये असुरक्षित समझी जाने वाली जगहों को पहचान करके वहां पेट्रोलिंग की जाती है? क्या महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने के लिये बने डेटाबेस, महिलाओं के लिये हेल्प डेस्क और जांच करने में मददगार ट्रैकिंग सिस्टम का कारगर तरीके से प्रयोग हो रहा है? शीर्ष अदालत का यह सवाल तार्किक है कि जब ये सिस्टम फेल हो जाता है तो विफलता के लिये किसी की जवाबदेही तय की जाती है? निस्संदेह, अदालत ने तंत्र की दुखती रग पर हाथ रखा है। सही मायने में ये सवाल हर किसी को परेशान करने वाले हैं। यह हकीकत है कि देश में नये-नये सुरक्षा कार्यक्रमों की घोषणा करने, पोर्टल, हेल्पलाइन और कमेटियां बनाने में तो कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जाती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी समस्या के निस्तारण के लिये कोई सिस्टम या मैकेनिज्म बना देना ही कर्तव्यों की इतिश्री मान लिया जाए?
उल्लेखनीय है कि अक्सर आम लोगों द्वारा शिकायत की जाती रही है कि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील सड़कों पर स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था नहीं होती, सीसीटीवी कैमरे पूरी तरह से काम नहीं कर रहे होते हैं। वहीं दूसरी ओर इस बाबत की गई शिकायतें अक्सर फाइलों में उलझकर रह जाती हैं। कहने को ऐसे अपराधों को रोकने वाला सिस्टम फाइलों में तो दर्ज होता है, लेकिन जब वास्तव में किसी व्यक्ति को इसकी जरूरत होती है, तो यह हमेशा की तरह नदारद मिलता है। ऐसे में देश की शीर्ष अदालत द्वारा सुरक्षा उपायों के ऑडिट, व्यवस्था की कमजोरियों की पहचान, किसी घटना के होने पर प्रतिक्रिया देने के समय और कार्यक्षमता के मूल्यांकन पर जोर देना, एक स्वागत योग्य कदम ही कहा जायेगा। सही मायने में ऐसे मामलों में सिर्फ पुलिस को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। ऐसे में सड़कों में स्ट्रीट लाइट न होने पर म्युनिसिपल एजेंसियां, ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी, प्रशासक, तकनीक उपलब्ध कराने वाले विभाग और न्याय व्यवस्था आदि सभी सुरक्षा शृंखला का हिस्सा हैं। निर्विवाद रूप से किसी भी एक स्तर पर विफलता के गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। दिल्ली के बहुचर्चित निर्भया प्रकरण के चौदह साल बाद मिला यह सबक स्पष्ट करता है कि कानून और योजनाएं तो बस शुरुआत मात्र हैं। असली कसौटी तो उनके लागू होने में है। इस आलोक में किसी पार्क में जाने, बस में चढ़ने या घर पैदल जाने वाली किसी महिला को इस बात पर आशंकित नहीं होना चाहिए कि किसी संकट की स्थिति में सुरक्षा के लिये बना सिस्टम काम करेगा भी या नहीं। निस्संदेह, किसी भी नागरिक को सुरक्षा प्रदान करना राज्य की जिम्मेदारी है। सही मायने में यही जवाबदेही ही उस जिम्मेदारी को हकीकत बनाती है। विश्वास किया जाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश के बाद शासन-प्रशासन महिला सुरक्षा की गंभीर चिंता को संवेदनशील ढंग से महसूस करेंगे। तभी संकट के समय महिलाएं आश्वस्त हो सकेंगी कि सिस्टम उनकी मदद के लिये तुरंत प्रभाव से कार्रवाई करने के लिए आगे आएगा।

