हकीकत से अक्ल

पाक की नई नीति में आर्थिक साझेदारी की बात

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पिछले दिनों पाकिस्तान ने अपनी पहली राष्ट्रीय सुरक्षा नीति की बानगी मीडिया के जरिये पेश की। एक अधिकारी द्वारा मीडिया को उपलब्ध यह जानकारी भू-आर्थिकी पर केंद्रित थी। फिर गत शुक्रवार को पाक प्रधानमंत्री इमरान खान ने इस राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के कुछ दस्तावेज सार्वजनिक किये। उल्लेखनीय है कि यह जानकारी उस दिन सार्वजनिक हुई, जिस दिन पंजाब पुलिस ने भारत-पाक सीमा पर पांच किलो विध्वंसक आरडीएक्स बरामद किया। उससे कुछ दिन पहले कश्मीर में एक पाक आतंकवादी को मार गिराया गया था। बहरहाल, भारत की जिज्ञासा इस बात को लेकर है कि क्या पाक की कथित भू-आर्थिक धुरी में कश्मीर व पंजाब में लगातार जारी अलगाववादी नीतियों को त्यागा जायेगा? दरअसल, अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप के बाद पाक लगातार भू-राजनीतिक समीकरणों के जरिये अपनी रक्षा क्षमताओं को उन्नत करता रहा है। फिलहाल भी रक्षा तैयारियों में संलिप्त है और समुद्री गतिविधियां भी बढ़ा रहा है। जाहिर है इन तैयारियों के केंद्र में भारत ही रहा है। इतना ही नहीं, जिस प्रतिगामी व खतरनाक विचारधारा को पाक में प्रश्रय दिया जाता रहा, वह भारत में हिंसक संघर्ष को ही बढ़ावा देती रही है। बहरहाल, अब जब पाक की अर्थव्यवस्था मरणासन्न अवस्था में है, तो अर्थव्यवस्था पर ध्यान देना लाजिमी है। आज अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं उसे ऋण देने में परहेज कर रही हैं। सर्वविदित है कि दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को लेकर खुद पाक का रवैया आक्रामक रहा है। इस आक्रामकता को कम करने के बजाय उलटे पाक भारत पर पूर्व की ओर कनेक्टिविटी को बंधक बनाने का आरोप लगाता रहा है। बहरहाल, वास्तविकता को सिर्फ बयानबाजी से नहीं झुठलाया जा सकता। यह दुनिया जानती है कि भारत अफगानिस्तान में भूख से जूझते लोगों को खाद्यान्न भेजना चाह रहा है, लेकिन पाक ने अपनी सीमा से होकर सहायता सामग्री भेजने पर दो माह से फैसला नहीं लिया। साफ है कि यदि पाक भारतीय उपमहाद्वीप में स्वतंत्र बाजार के लिये अपने व्यवसायों के रास्ते बंद रखता है तो भू-आर्थिक नीति के लक्ष्य शायद ही पूरे हो पायें।

निस्संदेह, किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के उत्थान के लिये सतत और समावेशी आर्थिक विकास की जरूरत होती है। उसके लिये उग्रवाद व संप्रदायवाद के खिलाफ संकल्प लेने की जरूरत है। शांति की स्थापना के बाद ही व्यापार-कारोबार को बढ़ावा मिल सकता है। एक तरफ कारोबार और दूसरी तरफ आईएसआई का वार, साथ-साथ नहीं चल सकता। बहरहाल, पाक ने अभी नई राष्ट्रीय सुरक्षा नीति के पूरे पत्ते नहीं खोले हैं, मगर आर्थिक संबंधों में सुधार विश्वास व सकारात्मक दृष्टिकोण से ही संभव है। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में जो बात उम्मीद जगाती है वह यह कि पाक भारत के साथ आगामी सौ साल तक शांति बनाये रखना चाहता है। इस पंचवर्षीय राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में भारत से रिश्ते सुधारने व व्यापार को बढ़ाने के साथ ही कश्मीर विवाद को किनारे रखने की बात भी सामने आती है। यानी सकारात्मक बातचीत के साथ सहयोग व व्यापार बढ़ाने की बात कही गई है। यदि पाक वाकई यह ईमानदारी से कह रहा है तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। दरअसल, कहीं न कहीं पाक चीन की नीति का अनुसरण कर रहा है। वह यह कि भारत-चीन सीमा पर विवाद के साथ दोनों देशों का कारोबार सौ अरब डॉलर पार कर चुका है। चीन के साथ हालिया विवाद के बावजूद दोनों देशों के व्यापार में वृद्धि ही हुई है। हालांकि, भारत पाक के रिश्तों में ज्यादा जटिलताएं हैं, उनका समाधान इतना आसान भी नहीं है। लेकिन इसके बावजूद दोनों देश हमेशा के लिये युद्ध व टकराव के साथ आगे नही बढ़ सकते। भारत कई बार कह भी चुका है कि घात व बात साथ-साथ नहीं चल सकते। इसके बावजूद पाक यदि कश्मीर में भारतीय संप्रभुता को स्वीकार करके आगे बढ़ने को तैयार है तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। जो दक्षिण एशिया में शांति व तरक्की की जमीन तैयार कर सकता है। इससे जहां बेहद खस्ता हाल से गुजर रही पाक की अर्थव्यवस्था को प्राणवायु मिल सकेगी, वहीं भारतीय कारोबारियों को नया बाजार मिल सकेगा। निस्संदेह, सफल व्यापार के लिये विश्वास व शांति अपरिहार्य हैं।

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