गेहूं की चुनौती

कीमतों पर नियंत्रण, बेहतर प्रबंधन जरूरी

गेहूं की चुनौती

कहने को तो यूक्रेन-रूस युद्ध के चलते दुनिया में उत्पन्न गेहूं संकट ने भारत के लिये निर्यात के द्वार खोल दिये हैं, लेकिन देश में रबी विपणन सीजन में सरकारी एजेंसियों द्वारा गेहूं खरीद में आई गिरावट चिंता बढ़ाने वाली है। वहीं घरेलू बाजार में गेहूं के दामों में तेजी से महंगाई के दौर में आटा महंगा होना मध्य वर्गीय उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ा रहा है। गेहूं की फसल की पूर्णता प्रक्रिया के दौरान मार्च व अप्रैल में अप्रत्याशित गर्मी के चलते लगभग छह फीसदी की गिरावट फसल उत्पादन में बतायी जा रही है। कृषि विशेषज्ञ इस प्रतिशत को ज्यादा बताते हैं। वहीं गेहूं निर्यात में वृद्धि के चलते इस उद्देश्य के लिये निजी कंपनियों द्वारा खरीद के कारण किसान एमएसपी से अधिक दाम पर अपना अनाज बेच रहे हैं। बेहतर दाम की उम्मीद में ही किसानों ने सरकारी खरीद एजेंसियों को कम गेहूं बेचा है। दरअसल, दुनिया के दो बड़े गेहूं उत्पादक रूस व यूक्रेन करीब तीस फीसदी गेहूं आपूर्ति विश्व बाजार में करते रहे हैं, दोनों के युद्ध में उलझने से आपूर्ति शृंखला में बाधा उत्पन्न हुई है। फलत: अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भारतीय गेहूं की मांग बढ़ी है। यह स्थिति किसानों के साथ व्यापारियों के लिये भी लाभप्रद है। ऐसे में यदि खुले बाजार में गेहूं की जमाखोरी बढ़ती है तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। एमएसपी से अधिक दाम मिलने से किसानों के चेहरों पर तो मुस्कान है लेकिन आम उपभोक्ताओं की चिंताएं बढ़ गई हैं। निस्संदेह महंगाई के दौर में लंबे समय तक इस स्थिति का बना रहना चिंता की बात होगी। खुदरा बाजार में आटे की कीमत तैंतीस रुपये पहुंचना लोगों की मुश्किल बढ़ाने वाला है क्योंकि एक साल की अवधि में यह वृद्धि करीब तेरह प्रतिशत के करीब है। इतना ही नहीं महंगे गेहूं से बेकरी उत्पादों की कीमतें भी बढ़ रही हैं। सरकार को आसन्न चुनौतियों के प्रति सतर्क रहना होगा।

हालांकि, सरकार भविष्य में गेहूं की किसी भी किल्लत की बात से इनकार कर रही है। उसका दावा है कि सरकार के पास राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम और प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के सभी लाभार्थियों को गेहूं की आपूर्ति के लिये पर्याप्त स्टॉक है। लेकिन इसके बावजूद यह स्थिति खाद्यान्न मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने में सहायक नहीं है, जो खाद्यान्न भंडारण व वितरण में चूक की ओर इशारा कर रही है। निस्संदेह, गेहूं निर्यात में वृद्धि के अल्पकालिक लाभ तो हो सकते हैं लेकिन सरकार को अपनी घरेलू प्राथमिकताओं का फिर से मूल्यांकन करना होगा। ऐसा न हो कि देश में खाद्यान्न कीमतें अनियंत्रित हो जायें। वह स्थिति बेहद खराब होगी कि हमें फिर से महंगे दामों पर गेहूं का आयात करना पड़े। इस स्थिति को हर हालत में टालने के प्रयास जरूरी हैं। सवा अरब से ज्यादा लोगों की खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करना आसान काम नहीं है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि ग्लोबल वार्मिंग का असर खेती पर नजर आने लगा है। ऊंचे तापमान के चलते गेहूं के उत्पादन में गिरावट को एक चुनौती के रूप में देखना होगा। यह किसान व सरकार के लिये चेतावनी ही है कि यदि नीति-नियंता ग्लोबल वार्मिंग के मुकाबले के लिये नीति तैयार नहीं करते और किसान बदलते मौसम के अनुरूप खेती के तौर-तरीकों में बदलाव नहीं लाते तो खाद्य सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। दीर्घकालीन लक्ष्यों के लिये जलवायु अनुकूल खेती को बढ़ावा देने की जरूरत है। ध्यान रहे कि भारत में दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी रहती है, जिसकी खाद्यान्न जरूरतों को पूरा करना हर सरकार का प्राथमिक दायित्व है। अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद ही हमें निर्यात को अपनी प्राथमिकता बनाना होगा। सरकार को याद रखना होगा कि देश में कोरोना संकट के चलते सरकारी स्टॉक में पहले के मुकाबले कम गेहूं है, इस बार पैदावार में गिरावट आई है और सरकारी खरीद में भी परिस्थितिवश कमी आई है। साथ ही पीडीएस व गरीब कल्याण योजना भी सरकार की जवाबदेही है। अत: निर्यात की गति नियंत्रित होनी चाहिए। साथ ही जमाखोरी व कालाबाजारी पर भी रोक लगे। 

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