लहर का कहर

देर से जागी दिल्ली सरकार

लहर का कहर

विशेषज्ञ पहले ही कह रहे थे कि सर्दी की दस्तक और पर्व शृंखला के बीच कोरोना संक्रमण फिर कहर बरपा सकता है। फिर त्योहारों की खरीदारी के बीच लोगों ने कोरोना संकट से जुड़े प्रोटोकॉल मास्क और दो गज दूरी की जिस तरह अनदेखी की, उससे ऐसे संक्रमण की आशंका बलवती हो चली थी। एक राज्य के रूप में दिल्ली सरकार की सीमाएं और केंद्र के साथ समय रहते तालमेल स्थापित न हो पाना भी संक्रमण रोकने की दिशा में बेहतर परिणाम न दे सका। बहरहाल, अब जब हाईकोर्ट ने सख्ती दिखायी तो दिल्ली सरकार हरकत में आयी है। बृहस्पतिवार को सर्वदलीय बैठक में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुश्किल वक्त में राजनीति से परे लोगों को सजग-सतर्क करने तथा सार्वजनिक स्थलों पर मास्क बांटने का आग्रह किया। साथ ही सार्वजनिक स्थलों पर बिना मास्क वाले लोगों पर जुर्माना चार गुना बढ़ाकर दो हजार कर दिया है। बुधवार को संक्रमितों की संख्या में तेजी और सौ से अधिक लोगों की मौत के बाद दिल्ली सरकार का चिंतित होना स्वाभाविक है। लेकिन जब यूरोपीय देशों में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर कहर बरपा रही थी तो हमें  भी सतर्क हो जाना चाहिए था। दरअसल, लंबे समय से लॉकडाउन में उकताये लोगों ने अनलॉक की प्रक्रिया शुरू होते ही अतिसक्रियता और लापरवाही बढ़ा दी, जिसके चलते संक्रमण को पांव पसारने का मौका मिल गया। यही वजह है कि पिछले एक सप्ताह में कोरोना संक्रमण के एक-तिहाई मामले सामने आये हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने दिल्ली सरकार के साथ मिलकर संक्रमण से बचाव व उपचार के अतिरिक्त संसाधन जुटाने की कवायद तेज की है। यदि दूसरे राज्यों से डॉक्टरों और चिकित्सा कर्मियों को दिल्ली बुलाया जा रहा है तो संकट की स्थिति का अहसास किया जा सकता है। दिल्ली के निजी अस्पतालों के 80 फीसदी आईसीयू बेड कोरोना मरीजों के लिये आरक्षित करने का कदम भी राहतकारी कहा जा सकता है। मोबाइल जांच सुविधा में इजाफा किया जा रहा है।  

हालांकि, दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार से सीमित क्षेत्रों और बाजारों में लॉकडाउन लगाने की वकालत की थी, लेकिन दिल्ली के कारोबारी इसका विरोध कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि लॉकडाउन के दौरान दिल्ली सरकार के राजस्व में पचास हजार करोड़ की कमी हुई तथा पांच लाख करोड़ रुपये के कारोबार का नुकसान हुआ लेकिन मौजूदा हालात को देखते हुए कुछ वैकल्पिक कदम तो उठाये ही जाने चाहिए। यह तो तय है कि जनता की तरफ से इस मुश्किल घड़ी में जो सहयोग मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। कुछ धार्मिक आयोजनों को लेकर जिस तरह की सियासत दिल्ली में हो रही है, उसे देखकर चिंता ही व्यक्त की जा सकती है। यहां तक कि अदालत को कहना पड़ा कि यदि जीवन सुरक्षित रहेगा तो अगली बार त्योहार खुशी-खुशी मना सकते हैं। निस्संदेह पर्व-त्योहार में मानव कल्याण ही निहित है, लेकिन देशकाल-परिस्थिति की नजाकत को भी समझना चाहिए। उत्तर प्रदेश, बिहार व महाराष्ट्र की सरकारों ने भी संक्रमण के खतरे को देखते हुए सार्वजनिक स्थलों पर पर्व न मनाने का आग्रह किया है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब तक कारगर वैक्सीन उपलब्ध नहीं हो जाती, कोरोना संकट विद्यमान मानना चाहिए। यदि हम चूक करते हैं तो दूसरी और तीसरी कोरोना लहर का खतरा बराबर बना रहेगा। हम न भूलें कि देश में सवा लाख से ज्यादा लोग कोरोना संकट के चलते अपनी जान गंवा चुके हैं। त्योहारों पर कोरोना संक्रमण रोकने के लिये निर्धारित मानकों का उल्लंघन करके तथा दिवाली पर अदालत के आदेश व राजनीतिक नेतृत्व के आग्रह को ठुकराकर प्रदूषण की गंभीर स्थिति के बीच जिस तरह जमकर आतिशबाजी की गई, उसकी कीमत तो चुकानी पड़ी। सरकारों के प्रयासों के बीच नागरिकों की भी जिम्मेदारी बनती है कि कोरोना संकट से लड़ने में निर्णायक भूमिका निभायें। हम यह न भूलें कि देश की आर्थिकी संकट के दौर से गुजर रही है, कोरोना का प्रसार उसे और नुकसान पहुंचायेगा।

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