अक्सर कहा जाता है कि जल ही जीवन है। लेकिन यह जल यदि दूषित हो तो क्या इसे जीवन कहा जा सकता है? यूं तो देश के गांवों में महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन जोर-शोर से चलाया जाता रहा है। लेकिन यह बात परेशान करती है कि पेयजल का बड़ा हिस्सा प्रदूषित पाया गया है। लोग सेहत के लिये हानिकारक जल पीने को मजबूर हैं। फलत: इससे उत्पन्न बीमारियों की चुनौतियों का सामना करने को बाध्य होते हैं। यह हमारे नीति-नियंताओं की विफलता ही कही जाएगी कि देश के करोड़ों लोग आज भी स्वच्छ जल की उपलब्धता से वंचित हैं। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि देश के तमाम इलाकों में लिए गए दूषित पेयजल नमूनों के करीब दो तिहाई हिस्से को शुद्ध करने के प्रयास नहीं हुए हैं। जो इस बात को दर्शाता है कि आज भी देश के करोड़ों लोग स्वच्छ पेयजल हासिल नहीं कर पा रहे हैं। यह स्थिति हमारे विकास के मॉडल व तरक्की के दावों की तार्किकता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। यही वजह है कि दूषित जल से होने वाले रोगों का दायरा बढ़ रहा है। यह अच्छी बात है कि जोर-शोर से घर-घर नल से जल पहुंचाने की सार्थक पहल की गई। निस्संदेह, हर व्यक्ति का अधिकार है कि उसे अपने घर में स्वच्छ पेयजल मिले। इसी मकसद से साल 2019 में जल जीवन मिशन को सिरे चढ़ाया गया था। लेकिन इस योजना के सुरक्षित तरीके से संचालन और स्वच्छ जल आपूर्ति को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। यह हकीकत है कि जब लोगों को स्वच्छ जल नहीं मिलता तो कई तरह के रोगों के पैदा होने का खतरा उत्पन्न हो जाता है। कहा भी जाता है कि हमारे अधिकांश रोग पेट से ही शुरू होते हैं। खासकर बच्चों व बुजुर्गों के लिये यह एक बेहद संवेदनशील मामला है। जिससे बचने के लिये स्वच्छ जल की आपूर्ति सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो जाता है।
देश में बार-बार स्वच्छ शहर का खिताब हासिल करने वाले मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में पिछले दिनों प्रदूषित पेयजल से होने वाली मौतों ने देश में खतरे की घंटी बजायी। घटना ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि इस दिशा में व्यापक स्तर पर प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले समय में देश के सामने गंभीर स्वास्थ्य चुनौती पैदा हो सकती है। उल्लेखनीय है कि जल जीवन मिशन के अंतर्गत ग्रामीणों तक पहुंचाए जा रहे पेयजल की गुणवत्ता की परख के लिये पानी के सैंपल लिए जाते हैं। साथ ही स्वच्छ पेयजल उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जवाबदेह लोगों के खिलाफ एक्शन भी लिया जाता है। यहां उल्लेखनीय है कि बीते साल जल जीवन मिशन के तहत तमाम राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों में पेयजल सैंपलों की जांच की गई। लेकिन चिंताजनक स्थिति यह है कि कुल नमूनों के छब्बीस प्रतिशत को ही शुद्ध करने के प्रयास हुए हैं। आखिर देश के किसी भी भाग में पेयजल के सैंपल लेने का क्या औचित्य रह जाता है, जब प्रदूषित जल को लेकर उपचारात्मक प्रयास न किए जाएं। सवाल केवल ग्रामीण इलाकों के लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराने का ही नहीं है, शहरी इलाकों में शुद्ध जल की उपलब्धता भी सुनिश्चित होनी चाहिए। गाहे-बगाहे देश के शहरी इलाकों में भी प्रदूषित जल पीने से बीमार होने की खबरें आती रहती हैं। लेकिन स्थानीय निकाय इस चुनौती को गंभीरता से नहीं लेते। संपन्न लोग तो आरओ तथा फिल्टर आदि वैकल्पिक व्यवस्था कर लेते हैं, लेकिन कमजोर वर्ग व सामान्य लोग दूषित पानी के उपयोग के लिये मजबूर होते हैं। स्वच्छ जल प्राप्त करना हर नागरिक का मौलिक व जीवन रक्षा का अधिकार जैसा है, जिसे गंभीरता से लेना चाहिए। इंदौर की घटना से सबक लेकर स्थानीय निकायों और प्रशासन को पेयजल व सीवर लाइन को सुरक्षित दूरी पर रखना सुनिश्चित करना चाहिए। जिन इलाकों में पेयजल पाइप लाइन को बिछे दशकों हो गए हैं, वहां उन्हें बदलने का काम युद्धस्तर पर किया जाना चाहिए। साथ ही रोजमर्रा की जरूरतों में काम आने वाले भूजल की गुणवत्ता सुधारने तथा घातक रसायनों से उसे मुक्त कराने की दिशा में गंभीर पहल की जाए।

