छिटपुट हिंसा की घटनाओं के बावजूद पश्चिम बंगाल में कमोबेश शांतिपूर्ण मतदान हुआ था। लेकिन चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद हो रही हिंसा की घटनाएं परेशान करने वाली हैं। भाजपा व टीएमसी के कुछ समर्थकों में हिंसक झड़पों के अलावा राज्य में पार्टी के अगुवा रहे सुवेंदु अधिकारी के करीबी चंद्रनाथ रथ की हत्या चौंकाने वाली है। इससे दोनों दलों के बीच तनाव बढ़ा है। राज्य में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार सुवेंदु अधिकारी का दावा है कि रथ की हत्या उनके करीबी होने के कारण की गई है। वहीं चंद्रनाथ के परिजनों का आरोप है कि यह हत्या ममता बनर्जी की भवानीपुर में अधिकारी से हुई हार का बदला लेने के लिये की गई है। उल्लेखनीय है कि इस दौरान कुछ भाजपा व टीएमसी कार्यकर्ताओं की भी हत्या की गई है। दरअसल, पंद्रह साल से सत्ता में काबिज रही टीएमसी पर भाजपा की बड़ी जीत ने दोनों पार्टियों के बीच तनाव को बढ़ाया है। यही वजह है कि भारतीय चुनाव आयोग पर हमलावर होते हुए ममता बनर्जी ने केवल चुनाव परिणामों को ही खारिज नहीं किया, बल्कि मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा देने तक से मना कर दिया। उनकी इस घोषणा ने लंबे समय से जारी टकराव को बढ़ाने का काम ही किया। इस घटनाक्रम से टीएमसी कार्यकर्ताओं को आक्रामक होने का मौका मिला। निश्चय ही यह स्थिति राज्य के हित में नहीं कही जा सकती। राज्य में कानून व्यवस्था को प्राथमिकता के आधार पर बहाल किए जाने की जरूरत है। कायदे में चुनाव परिणाम सामने आने के बाद ममता को सदाशयता का परिचय देते हुए कार्यकर्ताओं से शांत रहने की अपील राज्य हित में करनी चाहिए। यही लोकतंत्र का तकाजा भी है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा को भी अपने कार्यकर्ताओं को शांत रहने के लिये प्रेरित करना चाहिए। उन्हें चुनाव परिणाम सामने आने के बाद हिंसा से परहेज करना चाहिए। यही लोकतंत्र की प्रतिष्ठा भी है।
यह विडंबना ही है कि चुनाव आयोग द्वारा राज्य के अधिकारियों को विजय जुलूसों पर प्रतिबंध लगाने के निर्देश देने के बाद भी दोनों दलों के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। ऐसी स्थिति में राज्य पुलिस को हिंसा के प्रति जीरो टॉलरेंस दिखाते हुए, केंद्रीय बलों के साथ कानून व्यवस्था बहाल करने के लिये मिलकर काम करना चाहिए। यूं तो पूरे राज्य में ही, अन्यथा खासकर संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ायी जानी चाहिए। हिंसक वारदातों व तोड़फोड़ में शामिल लोगों की पहचान करके उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। किसी भी राजनीतिक दल से संबद्धता की परवाह किए बिना उपद्रवियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना वक्त की जरूरत है। भाजपा व टीएमसी को अपने कार्यकर्ताओं से संयम बरतने को कहना चाहिए। वास्तव में अतीत में हिंसा का लंबा इतिहास रखने वाले पश्चिम बंगाल को अब नये सिरे से शुरुआत करके विकास के पथ पर लौटना चाहिए। यह निर्विवाद सत्य है कि किसी भी हिंसा की कीमत आखिर आम जनता को ही चुकानी पड़ती है। यदि पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो पाते हैं कि राज्य की राजनीति में अपराध जगत से जुड़े व दबंग किस्म के लोग दखल देते रहे हैं। कभी वे राजनीतिक दलों के लिए बूथ लूटने का काम किया करते थे। एक समय वामपंथी सरकार में दखल रखने वाले ये लोग कालांतर तृणमूल कांग्रेस के लिये काम करने लगे थे। दरअसल, ये लोग अपनी सुविधा के हिसाब से राजनीतिक शरण लेकर अपने मंसूबों को पूरा करते रहे हैं। जाहिर है,अब राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई है तो वे भाजपा की छतरी के नीचे आने की कोशिश कर रहे होंगे। कहीं न कहीं हालिया हिंसा में उनकी भी भूमिका हो सकती है। यही वजह है कि भाजपा की तरफ से कहा जा रहा है कि अब तक टीएमसी से जुड़े रहे कुछ लोग खुद को भाजपा का बता रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी को यहां तक कहना पड़ा कि जब तक भाजपा किसी व्यक्ति को पार्टी का सदस्य न बनाये तब तक वह व्यक्ति खुद को भाजपा का नहीं बता सकता है। बहरहाल, राज्य में शांति की स्थापना शासन-प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए।

