असुरक्षित बेटियां

तंत्र की संवेदनशीलता-सतर्कता जरूरी

असुरक्षित बेटियां

हाथरस, होशियारपुर से लेकर बल्लभगढ़ तक बेटियों के साथ क्रूरता की हदें पार करती घटनाओं ने पूरे देश के अंतर्मन को झिंझोड़ा है। इन घटनाओं के अलावा भी बेटियों के साथ यौन हिंसा की घटनाओं का अंतहीन सिलसिला जारी है। यह बात अलग है कि ये घटनाएं राजनीतिक निहितार्थों के अभाव और मीडिया की चूक के कारण राष्ट्रीय परिदृश्य में विमर्श का हिस्सा नहीं बन पातीं। सोमवार को बल्लभगढ़ में बी.कॉम. अंतिम वर्ष की छात्रा के अपहरण की असफल कोशिश के बाद दिनदहाड़े हुई हत्या कानून व्यवस्था के प्रति अपराधियों के बेखौफ होने को दर्शाती है। यह घटना जहां अपराधी के निरंकुश व्यवहार को दर्शाती है, वहीं पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करती है। छात्रा के अपहरण की कोशिश दो वर्ष पूर्व भी हुई थी। यदि इस मामले में सख्त कार्रवाई होती तो शायद छात्रा आज जिंदा होती। उस पर हरियाणा के गृहमंत्री का संवेदनहीन बयान कि पुलिस के द्वारा व्यक्तिगत सुरक्षा कर पाना संभव नहीं है। शासन-प्रशासन का संवैधानिक दायित्व बनता है कि व्यक्ति विशेष के जीवन पर आने वाले किसी भी खतरे से उसकी रक्षा की जाये। खासकर लड़कियों की शिक्षण संस्थाओं के बाहर तो सुरक्षा इंतजाम ऐसे होने चाहिए कि बेटियां सिरफिरे आशिकों से अपनी रक्षा करने में सक्षम हो सकें। सवाल समाज में पनप रही आपराधिक मनोवृत्ति का भी है कि क्यों और कैसे पथभ्रष्ट युवा हाथरस, होशियारपुर और बल्लभगढ़ जैसी घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं और बेकसूर बेटियों को उनकी क्रूरता का शिकार बनना पड़ रहा है। हाल ही में आये एक सर्वेक्षण में इस बात का खुलासा हुआ था कि समाज में बेटियों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित हो रही है। अभिभावक अब बेटियों के परिवार में आने का स्वागत कर रहे हैं और बिना किसी भेदभाव के उनका बेहतर ढंग से भरणपोषण कर रहे हैं। लेकिन बेटियों के प्रति लगातार बढ़ रहे अपराधों से उनका उत्साह कम हो सकता है। इन आशंकाओं को दूर करना शासन-प्रशासन का दायित्व बनता है।

दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट ने हाथरस में यौन हिंसा की शिकार हुई युवती को न्याय दिलाने की दिशा में सार्थक पहल की है। मंगलवार को शीर्ष अदालत ने फैसला सुनाया कि हाथरस कांड मामले में सीबीआई की जांच की निगरानी इलाहाबाद हाईकोर्ट करेगा। हाईकोर्ट मामले की जांच के बाद फिर तय करेगा कि केस का स्थानांतरण उत्तर प्रदेश से दिल्ली किया जाये या नहीं। साथ ही पीड़िता के परिजनों व गवाहों की सुरक्षा पर भी उच्च न्यायालय ध्यान देगा। दरअसल, इस सारे प्रकरण में प्रदेश सरकार की कारगुजारियों के मद्देनजर पीड़ित परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी कि मामले का ट्रायल दिल्ली में हो। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने एक जनहित याचिका व वकीलों की ओर से दायर हस्तक्षेप याचिकाओं पर पंद्रह अक्तूबर को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया था। आशंका जतायी जा रही थी कि उत्तर प्रदेश में निष्पक्ष सुनवाई की संभावना कम है। जांच को बाधित करने के आरोप लगाये गये थे। ऐसी आशंकाएं 14 सितबंर को यौन हिंसा की शिकार युवती के शव का आनन-फानन में परिवार की गैर मौजूदगी में रात में अंतिम संस्कार करने के बाद जतायी जा रही थी। दरअसल, इस सारे प्रकरण से उत्तर प्रदेश पुलिस व शासन सवालों के घेरे में आ गया था। इस मामले में भारी राजनीतिक विरोध के बाद योगी सरकार ने मामले की जांच पहले एसआईटी को सौंपी थी और बाद में जांच सीबीआई से कराने की सिफारिश की गई। मामले में राजनीतिक विरोध और पीड़ित परिवार की आशंकाओं के बीच अदालत ने मामले में हस्तक्षेप किया। इससे पूर्व योगी सरकार की ओर से शीर्ष अदालत में दायर हलफनामे में कहा गया था कि पीड़ित परिवार और गवाहों को तीन स्तरीय सुरक्षा प्रदान की गई है। बहरहाल, बेटियों के खिलाफ होने वाली हिंसा को रोकने के लिये पुलिस-प्रशासन को संवेदनशील व जवाबदेह बनाने की जरूरत है। वहीं समाज को भी मंथन करना होगा कि युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट होने से कैसे बचाया जाये।

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