गांव को दो छांव

गांव को दो छांव

सरकार चुस्त हो, ग्रामीण जागरूक रहें

शहरों में कोहराम मचाने के बाद कोरोना संक्रमण ने अब गांवों को अपनी चपेट में ले लिया है। शहरों के मुकाबले गांवों से संक्रमण के ज्यादा मामले सामने आना निस्संदेह डराने वाला है। भय इसलिए भी क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा ढांचा कमोबेश सभी राज्यों में चरमराया हुआ है। ग्रामीण स्तर पर अपेक्षित जागरूकता नहीं लायी जा सकी है। हालांकि, हालात बदले जरूर हैं, मगर उम्मीदों के अनुरूप नहीं। अशिक्षा, रूढ़ियां और पुरातन सोच इसमें बाधक रही हैं। लेकिन ग्रामीण जनजीवन की सहजता-सरलता के चलते कोविड-19 से बचाव के उन उपायों का सख्ती से पालन नहीं हो पाया है, जिनसे संक्रमण की चेन तोड़ी जा सकती थी। ऐसे में जब देश का चिकित्सातंत्र भगवान भरोसे नजर आ रहा है, तब जागरूकता ही बचाव का पहला उपाय हो सकता है। हालांकि, हरियाणा सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना संकट के विस्तार के बाद कई उपाय किये हैं। शुरुआत में मनोहर लाल खट्टर सरकार ने निगरानी के लिये बारह आईएएस अधिकारियों को निगरानी-नियंत्रण की जिम्मेदारी दी। फिर आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को उपचार में आर्थिक मदद की घोषणा हुई। सरकार ने दावा किया कि राज्य के गांवों में तेजी से जांच व उपचार के लिये आठ हजार टीमें बनायी गई हैं, जिसमें डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी व आंगनवाड़ी कार्यकर्ता होंगे, जो घर-घर जाकर कोविड जांच करेंगे। हर गांव में आइसोलेशन सेंटर स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्रों व चौपालों में बनाने की बात कही गई थी, जिसके लिये आबादी के हिसाब से गांवों को तीस से पचास हजार रुपये की मदद देने की बात कही गई थी। महत्वपूर्ण बात यह है कि समय रहते इन घोषणाओं पर प्रभावी रूप से अमल हो, जिसमें ग्रामीणों की जागरूकता और स्वयं सहायता समूहों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। संसाधनों की मौजूदा स्थिति में बचाव ही उपचार है। महामारी के मुकाबले के लिये जागरूकता और वैज्ञानिक सोच होना भी जरूरी है।

जरूरी है कि संकट की इस घड़ी में ग्रामीण जीवनशैली और लोक व्यवहार के अनुरूप ही कोरोना से बचाव की पहल की जाये, जिसे ग्रामीण सहजता से स्वीकार करें और उसके क्रियान्वयन में सक्रिय भागीदारी निभाएं। याद रहे कि सहजता-सरलता का ग्रामीण जीवन सदियों से परम्पराओं व मान्यताओं से गहरे तक जुड़ा है। उसी के जरिये महासंकट का समाधान निकालें। पिछले साल भी मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर की पहल पर ‘ठीकरी पहरा’ देने की कवायद शुरू हुई थी, जिसमें गांव के युवा-जागरूक लोग पहरा देकर संक्रमण की चेन को तोड़ने का प्रयास करते हैं। बाहर से आने-जाने वालों की निगरानी करते हैं। इसके सकारात्मक परिणाम सामने आये थे। सरकार फिर से ‘ठीकरी पहरा’ अनिवार्य बनाने की कोशिश में है। इस संकट में स्वयं सहायता समूहों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है जो ग्रामीणों को कोविड प्रोटोकाल के अनुपालन के लिये प्रेरित करें। गांव में ऐसी व्यवस्था करें कि संक्रमण से पीड़ितों के लिये प्राथमिक जांच व सामान्य उपचार की उपलब्धता सुनिश्चित हो। लक्षणों की जांच और स्थिति को गंभीर होने से बचाने के साथ ही स्थिति गंभीर होने पर निकटवर्ती अस्पताल में भर्ती करवाने का प्रयास कर सकते हैं। समय रहते उपचार व ऑक्सीजन की उपलब्धता से कई जीवन बचाये जा सकते हैं। साथ ही लोगों को कोरोना वैक्सीन लगाने के लिये वैक्सीनेशन केंद्रों तक ला सकते हैं। ध्यान रहे कि देश में हरियाणा नंबर एक राज्य है, जहां कोरोना वैक्सीन का सबसे ज्यादा अपव्यय हुआ। ऐसे संकट के वातावरण में भिवानी के बरवा गांव की पहल सारे हरियाणा के लिये अनुकरणीय है। जहां जागरूक लोगों ने ‘कोरोना सहायता समिति’ बनाकर, कोरोना संक्रमितों के उपचार का बीड़ा उठाया है। समिति ने चार चिकित्सकों की व्यवस्था की है, जो कोरोना संक्रमण के प्राथमिक उपचार में मदद करते हैं। निस्संदेह, मरीजों को अस्पताल में भर्ती न होना पड़े, इसके लिये पहले ही प्रयास किये जाने जरूरी हैं। इससे कई लोगों की जान बचाने के प्रयास सार्थक हो सकते हैं। साथ ही दूसरे लोगों को ऐसा करने की प्रेरणा मिल सकेगी। यह वक्त जांच बढ़ाने, आइसोलेशन केंद्र खोलने, चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने तथा टीकाकरण में तेजी लाने का है।

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