अमेरिका के इतिहास में शायद ही कोई डोनाल्ड ट्रंप जैसा अधीर, अपरिपक्व बयानवीर और व्यापारी सोच का राष्ट्रपति हुआ हो। संयम व गरिमा शब्द उनके शब्दकोश में ही नहीं हैं। सोशल मीडिया पोस्ट में अमेरिका-इस्राइल युद्ध के चरम के बीच उन्होंने जिन अपशब्दों का प्रयोग ईरान के लिये किया, वो उनकी हताशा को ही दर्शाता है। उनके बयानों की पूरी दुनिया के साथ अमेरिका के भीतर भी कड़ी आलोचना हुई है। आज अमेरिका के नागरिक भी सोचते होंगे कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतंत्र में राष्ट्रपति को इतने निरंकुश अधिकार देना क्या प्रजातंत्र के हित में है? निश्चित रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर, अपशब्दों और धार्मिक संदर्भों के साथ तेहरान को दी गई चेतावनी, ट्रंप के आवेगपूर्ण उकसावे के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। एक महाशक्ति के मुखिया द्वारा ऐसी सतही भाषा का प्रयोग न केवल अशोभनीय है बल्कि घातक परिणामों की ओर ले जाने वाला भी है। जाहिरा तौर उनकी धमकियां ईरान को बातचीत की मेज पर लाने के बजाय, उसे और आक्रामक तरीके से जवाबी कार्रवाई करने को उकसाएंगी। दरअसल,अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप यह जताने की असफल कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा युद्ध मध्ययुगीन धर्मयुद्ध का विस्तार है। जिसमें सदियों तक ईसाई और मुसलमान आपस में वर्चस्व के लिये युद्ध करते रहे हैं। उन्होंने राजनीति में धार्मिक भावनाओं का भरपूर इस्तेमाल करते हुए ईरान में मार गिराए गए अमेरिकी फाइटर जहाज के पायलट के बचाव को ‘ईस्टर का चमत्कार’ बताने से भी गुरेज नहीं किया। जाहिरा तौर पर पुनरुत्थान और आशा का प्रतीक माने जाने वाले ईसाई धर्मावलंबियों के एक पवित्र दिन का हवाला देना, सैन्य अभियान को नैतिक और दैवीय रंग देने का ही एक असफल प्रयास है। निश्चित तौर पर इस तरह की सतही बयानबाजी एक जटिल भू-राजनीतिक संघर्ष को धार्मिकता की एक सरल कहानी में बदलने का जोखिम पैदा करती है। जो ट्रंप की सैन्य अभियान की तार्किकता सिद्ध करने की विफलता को भी दर्शाती है।
यही वजह है कि अमेरिकी सांसदों ने यह पता लगाने के लिये जांच की मांग की है कि क्या धार्मिक मान्यताओं का प्रयोग सैन्य कार्रवाई को सही ठहराने के लिये किया जा सकता है? निश्चित रूप से उन सांसदों की चेतावनी एक मूलभूत लोकतांत्रिक सिद्धांत पर आधारित है, वो है चर्च और राज्य का पृथक्करण का सिद्धांत। उनका तर्क है कि सैन्य निर्णय कानून,रणनीति और जवाबदेही द्वारा निर्देशित होने चाहिए, न कि ईश्वर या बाईबल की भविष्यवाणियों का हवाला देकर। निश्चित रूप से ट्रंप की इन आक्रामक ब्यानबाजियों और कारगुजारियों की कीमत आने वाले वर्षों में अमेरिकियों को चुकानी पड़ सकती है। वहीं दूसरी ओर ट्रंप की गैरजिम्मेदार धमकियां पश्चिमी एशिया में अमेरिकी रक्षा कर्मियों के जीवन को भी खतरे में डाल सकती हैं। वहीं दूसरी ओर गुप्त राजनयिक प्रयासों को भी पटरी से उतार सकती हैं। दुनिया की महाशक्ति के सबसे शक्तिशाली नेता होने के नाते,उन्हें यह जरूर समझना चाहिए कि उनके बेतुके शब्दों से अमेरिकी विदेशी नीति को अपूरणीय क्षति पहुंच सकती है। जाहिरा तौर पर सशक्त नेतृत्व के लिये जिम्मेदारी के साथ विश्वसनीयता और स्पष्टता भी बेहद जरूरी है। ऐसे में धर्म को हथियार बनाने का उनका यह प्रयास घोर हताशा को ही दर्शाता है। जो इस बात की भी पुष्टि करता है कि अमेरिकी जनता ने एक व्यक्ति की क्षमताओं से कहीं अधिक दायित्व उन्हें सौंपा है। जिसकी वजह यह भी है कि ट्रंप ईरान की क्षमताओं का आकलन करने में चूके हैं। वे जमीनी हकीकत से इतर लगातार अमेरिका की जीत के दावे कर रहे हैं। जब कि वास्तविकता यह है कि सब कुछ खत्म करने के दावों के बावजूद ईरान अमेरिका व इस्राइल को पूरी टक्कर दे रहा है। वह खाड़ी में न केवल अमेरिका के मित्र देशों को निशाना बना रहा है बल्कि इस्राइल के भीतर व मध्यपूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले कर रहा है। ट्रंप के बड़े-बड़े दावों के बावजूद न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन ही हुआ है और न ही यह तय हो पाया कि ईरान भविष्य में परमाणु क्षमता हासिल नहीं कर सकता है। उलटे अमेरिका में ट्रंप की लोकप्रियता में तेजी से गिरावट आई है।

