ऐसे वक्त में जब महंगाई के कारण जीवनयापन कठिन हो रहा है, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एन.पी.पी.ए. द्वारा कुछ जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में वृद्धि की इजाजत देना कमजोर वर्गों के लिए ‘कंगाली में आटा गीला होना’ जैसा है। एन.पी.पी.ए. द्वारा जिन दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी की इजाजत दी गई है, उनमें कुछ कैंसर की दवाएं, एंटी-टेटनस सीरम और बच्चों के टीकों की कीमतों में पचास प्रतिशत की वृद्धि शामिल है। निश्चय ही यह फैसला पब्लिक हेल्थ पॉलिसी से जुड़ी विसंगतियों को दर्शाता है। निस्संदेह, भारत जैसे देश में जरूरी दवाओं को सस्ता रखना बेहद जरूरी है, जहां बहुत से परिवार इलाज का खर्च अपनी जेब से उठाते हैं। वहीं दूसरी ओर, यह भी जरूरी है कि जीवनरक्षक दवाओं की बाजार में सहज उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। बहुत संभव है कि अमेरिका-ईरान युद्ध संकट से बाधित आपूर्ति शृंखला के चलते कुछ दवाइयों व टीकों की कीमतों में बढ़ोतरी को तार्किक बताया जाए, लेकिन चिकित्सा व्यवस्था में अमीर-गरीब की आर्थिक क्षमता को लेकर उठने वाले सवाल न्यायसंगत ही कहे जाएंगे। दरअसल, एन.पी.पी.ए. ने दवाओं की कमी और बढ़ती लागत को कीमत वृद्धि का कारण बताया है। दलील दी गई कि यदि दवा बनाने वाली कंपनियां इनकी उत्पादन लागत नहीं निकाल पाती हैं तो वे खुले बाजार में इन दवाइयों की आपूर्ति बंद कर सकती हैं। लेकिन इसके बावजूद गरीब तबके की सीमाओं और आर्थिक स्थिति का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।
बहरहाल, इस बाबत दी गई दलीलों के बावजूद एक सच्चाई को छिपाया नहीं जा सकता कि इस देश में करोड़ों लोग बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का खर्च उठाने के लिए संघर्ष करते हैं। निर्विवाद रूप से कैंसर के इलाज और बच्चों को बीमारियों से बचाने वाली दवाइयों की कीमतों में पचास फीसदी बढ़ोतरी आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को गहरे आर्थिक संकट में डाल सकती हैं। मरीजों के लिए इलाज के खर्च में दवाओं के अलावा, रोग की जांच, दूर-दराज के क्षेत्रों से बड़े अस्पतालों तक की यात्रा, अस्पताल में भर्ती होने का खर्च तथा इस दौरान होने वाली आय की हानि भी शामिल होती है। ऐसे में दवाओं की कीमतों में वृद्धि का अतिरिक्त बोझ उन्हें इलाज और जीवित रहने के बीच कई मुश्किल फैसले लेने को मजबूर कर सकता है। इसका समाधान किफायती होने और उपलब्धता के बीच चयन करने में नहीं है, बल्कि एक ऐसा तंत्र विकसित करने में है, जो दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। सरकार को सरकारी अस्पतालों के लिए दवा खरीद व्यवस्था को पारदर्शी व मजबूत बनाने की जरूरत है। उसे सरकारी अस्पतालों के जरिये बिना किसी बाधा के दवाइयों की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही, स्वास्थ्य बीमा योजनाओं में जरूरी दवाइयों को भी शामिल करना चाहिए, जिससे खास सब्सिडी के जरिये गरीब मरीजों को अचानक कीमतों में बढ़ोतरी से बचाया जा सके। इसके अलावा, दवाइयों की कीमतों से जुड़ी नीतियों की समय-समय पर समीक्षा भी होनी चाहिए, जिससे पता चल सके कि वास्तव में दवाइयों की लागत में कितनी वृद्धि हुई है।
