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इलाज का बोझ

प्रभावी-पारदर्शी बीमा कवर अनिवार्य हो

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किसी लोक कल्याणकारी सरकार का पहला दायित्व बनता है कि वो अपने नागरिकों के लिए सस्ती व प्रभावी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराये। दुनिया के तमाम देशों में सरकारों के स्तर पर ऐसी नीतियां बनी हैं कि लोगों को स्वास्थ्य संकट आने पर उपचार खर्च के तनाव का रोग अलग से नहीं लेना पड़ता है। विशेषकर बुजुर्ग आबादी का विशेष ख्याल रखा जाता है। जिस उम्र में उनका शरीर क्षीण हो रहा होता है और आय के साधन न के बराबर होते हैं, सरकारी चिकित्सा का सुरक्षा कवच बड़ा संबल होता है। विडंबना यह है कि भारत में स्वास्थ्य सेवाएं गहरे विरोधाभास से जूझ रही हैं। हमारी सरकारी चिकित्सा व्यवस्था खुद बीमार है। देश में कम स्वास्थ्य बजट, राजनीतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के चलते सरकारी अस्पतालों में सब कुछ होते हुए भी गरीब व कमजोर वर्ग के लोगों को गुणवत्ता का उपचार नहीं मिल पाता है। हाल ही में सामने आए सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के एक नये सर्वेक्षण में बताया गया है कि देश की लगभग आधी आबादी के पास किसी न किसी प्रकार का स्वास्थ्य बीमा कवर है। लेकिन विडंबना यह है कि स्वास्थ्य बीमा कवर होने के बावजूद उनकी जेब से खर्च होने वाला चिकित्सा व्यय अधिक बना हुआ है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सरकार द्वारा समर्थित योजनाओं ने बीमा कवरेज के विस्तार को गति दी है। उल्लेखनीय है कि देश के ग्रामीण इलाकों में अब शहरी क्षेत्रों के मुकाबले बीमा कवरेज अधिक है। इसके बावजूद दुखद स्थिति यह है कि देश के करोड़ों परिवारों के लिए आज भी बीमार पड़ना गंभीर आर्थिक संकट पैदा कर देता है। वहीं दूसरी ओर, इस सर्वेक्षण ने एक स्पष्ट खामी को भी उजागर किया है कि आज भी अस्पताल में भर्ती होने के प्रत्येक मामले के लिए मरीज के जेब से होने वाले खर्च के औसत बिल 34,000 रुपये से अधिक हैं।

यह हकीकत है कि बीमा कवरेज के बाद भी मरीजों के उपचार पर होने वाला खर्च भारत के अधिकांश आम परिवारों की वहन क्षमता से कहीं अधिक है। आखिर देश में बीमा दायरा बढ़ने के बावजूद, मरीजों पर चिकित्सा उपचार का आर्थिक बोझ लगातार क्यों बढ़ रहा है? क्या बीमा कवरेज कारोबार के लिए उत्साहित रहने वाली बीमा कंपनियों और बड़े अस्पतालों की कमाई का ही जरिया बनकर रह गया? हाल के वर्षों में इस अपवित्र गठबंधन के कई मामलों का खुलासा भी हुआ है। लेकिन नियामक तंत्र की सख्ती के अभाव में मरीजों के दोहन का यह खेल बदस्तूर जारी है। जानकार बताते हैं कि चिकित्सा उपचार की बढ़ती दर अक्सर मुद्रास्फीति से भी अधिक होती है। निस्संदेह, यह अपवित्र कारोबार मरीजों से मुनाफा कमाने वालों के मानवीय सरोकारों पर सवालिया निशान लगाता है। वैसे चिकित्सा सेवा में मुनाफा बढ़ते देख निजी स्वास्थ्य सेवाओं का दबदबा भी बढ़ा है। हाल के वर्षों में सरकारी अस्पतालों की बदहाली के चलते ज्यादातर भारतीय निजी अस्पतालों की ओर ही रुख कर रहे हैं। लेकिन वहां सरकारी अस्पतालों से कई गुना अधिक उपचार लागत होती है। कोरोना संकट में हमने देखा कि महंगे उपचार के चलते तमाम लोग गरीबी के दलदल में चले गए। दरअसल, आज हालातवश सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं वाले अस्पतालों में भर्ती होने की हिस्सेदारी घटने के साथ ही मरीजों को अनिवार्य रूप से अधिक महंगे विकल्पों की ओर धकेला जा रहा है, जिससे बीमा सुरक्षा के लाभ कम हो रहे हैं। आयुष्मान भारत जैसी प्रमुख योजनाओं का त्रुटिपूर्ण कार्यान्वयन भी एक और बाधा बनी है। वहीं देर से मिलने वाली सरकारी चिकित्सा बीमा राशि भी मरीजों के लिए किफायती सेवाओं को बाधित कर रही है। यदि इन सरकारी योजनाओं में सूचीबद्ध अस्पताल मरीजों के उपचार से पीछे हट जाते हैं तो सार्वजनिक रूप से वित्त पोषित बीमा की अवधारणा खतरे में पड़ जाती है, जिससे वंचित होने से नागरिकों का उपचार अधर में लटक जाएगा। निस्संदेह, बीमा कवरेज ही काफी नहीं है, देश को अपने सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचे को भी मजबूत करना होगा। साथ ही सरकारी योजनाओं के तहत समय पर भुगतान सुनिश्चित करना होगा। अन्यथा अस्पताल के बिल मजबूर लोगों की आय व बचत को पलीता लगाते रहेंगे।

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