डिजिटल क्षेत्र में भारत के अग्रणी राज्य कर्नाटक ने सोलह साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया के घातक प्रभावों से बचाने के लिये देश में सबसे पहले अनुकरणीय पहल की है। राज्य सरकार ने 2026-27 के बजट सत्र के दौरान घोषणा की है कि किशोरवय अब सोशल मीडिया का उपयोग नहीं कर सकेंगे। यह निर्णय अभिभावकों की उस चिंता को कम करता है जो अनियंत्रित डिजिटल गतिविधियों से उत्पन्न होने वाले जोखिम से परेशान थे। जिसमें साइबर बुलिंग व साइबर धोखाधड़ी भी शामिल है। कर्नाटक की पहल के बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू ने भी विधानसभा में घोषणा की है कि अगले नब्बे दिनों के भीतर 13 साल से कम उम्र के बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगा दी जाएगी। इस तरह आंध्र प्रदेश कर्नाटक के बाद ऐसा सख्त फैसला लेने वाला दूसरा राज्य बनने जा रहा है। इस प्रकार ये दो राज्य तेजी से ऑनलाइन होती दुनिया में ‘किशोरों की सुरक्षा कैसे की जाए’, की वैश्विक बहस में शामिल हो गए हैं। उल्लेखनीय है कि ऐसी पहल पहले आस्ट्रेलिया और फ्रांस आदि देशों में हो चुकी है। हालांकि, इन राज्यों की पहल सराहनीय है, लेकिन इस प्रतिबंध का प्रभावी क्रियान्वयन कैसे सुनिश्चित होगा, इसका प्रारूप अभी स्पष्ट नहीं है। दरअसल, देश-दुनिया के मनोवैज्ञानिक और बाल स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी है कि सोशल मीडिया का अनियंत्रित उपयोग किशोरों के मानसिक और भावनात्मक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। उल्लेखनीय है कि इस चिंता का जिक्र 2025-26 के केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में भी किया गया था। कर्नाटक व आंध्र प्रदेश की यह पहल तेजी से विकसित हो रहे तकनीकी परिदृश्य के प्रति एक सुरक्षात्मक दृष्टिकोण ही दर्शाती है। लेकिन यहां सवाल उठता है कि इस कार्य योजना को अमलीजामा कैसे पहनाया जाएगा? यह हकीकत जानते हुए कि आज के डिजिटल युग में, स्मार्टफोन और ऐप्स शिक्षा, संचार और दैनिक जीवन के अभिन्न अंग बन गए हैं।
यहां उल्लेखनीय है कि तमाम स्कूल असाइनमेंट और अपडेट के लिये मैसेजिंग एप्स, ऑनलाइन पोर्टल और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर निर्भरता बढ़ गई है। यही वजह है कि छात्रों द्वारा ‘शैक्षिक’ और ‘सामाजिक’ उपयोग के बीच अंतर करना मुश्किल साबित हो सकता है। वहीं चिंता की बात यह भी कि किशोरों की आयु का सत्यापन कैसे व्यावहारिक बनाया जा सकेगा। वहीं देखना होगा कि सोशल मीडिया को संचालित करने वाली तकनीकी कंपनियां किस हद तक इस दिशा में सहयोग करेंगी। सहयोग न मिलने पर प्रतिबंध की व्यावहारिकता पर सवालिया निशान लग सकते हैं। उन परिवारों में जहां एक ही मोबाइल फोन का परिवार के अन्य सदस्य भी उपयोग करते हैं, वहां प्रतिबंध की व्यावहारिकता पर सवाल लग सकते हैं। उल्लेखनीय है कि आस्ट्रेलिया में पहले ही सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के लिये सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लागू है। वहीं दूसरी ओर फ्रांस जैसे अन्य देश भी सख्त डिजिटल सुरक्षा नियमों को लागू करने को लेकर गंभीर हैं। इसमें दो राय नहीं कि बच्चों को बेहतर डिजिटल सुरक्षा दी जानी जरूरी है, लेकिन केवल नियमन मात्र से इस जटिल समस्या का समाधान संभव नहीं हो सकता है। इस दिशा में सार्थक परिवर्तन सरकारों, स्कूलों, तकनीकी प्लेटफॉर्मों और सबसे महत्वपूर्ण रूप से अभिभावकों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण पर निर्भर करेगा। हालांकि, किशोरों को सोशल मीडिया की विकृतियों से बचाने के लिये तात्कालिक पहल केंद्र सरकार की तरफ से की जाती तो उसका देशव्यापी प्रभाव होता। लेकिन इसके बावजूद यदि कर्नाटक व आंध्र प्रदेश ने इस दिशा में पहल की है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि अन्य राज्य भी इससे प्रेरणा ले सकेंगे। फिर निश्चित तौर पर केंद्र सरकार को भी देश में एक केंद्रीय कानून लाने को बाध्य होना पड़ सकता है। वहीं केंद्र सरकार को इस मुद्दे पर विषय विशेषज्ञों और समाज के विभिन्न वर्गों से भी राय लेनी चाहिए। ऐसे वक्त में जब बच्चों का स्क्रीन टाइम एक लत के रूप में लगातार बढ़ा है तथा उनकी एकाग्रता कम होने से पढ़ाई बाधित हो रही है, तो इस संकट का समाधान केंद्र व राज्यों की प्राथमिकता होनी चाहिए।

