वक्त का फैसला

महंगाई नियंत्रण में कारगर भी हो कदम

वक्त का फैसला

देश में जिस तरह थोक व खुदरा मुद्रास्फीति लक्ष्मण रेखा पार कर रही थीं और वैश्विक स्थितियां सामान्य होती नजर नहीं आ रही हैं, उसे देखते हुए केंद्रीय बैंक से पहल की उम्मीद थी। कयास था कि जून में मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद फैसला होगा। लेकिन समिति ने जिस तरह अचानक बैठक करके प्रमुख नीतिगत दरों अर्थात रेपो रेट तथा सीआरआर दर में वृद्धि की है, वह स्थिति की गंभीरता को दर्शाने वाली है। आरबीआई ने रेपो रेट में .40 फीसदी की वृद्धि करके इसे 4.4 फीसदी किया है। जाहिर है बंैकों को दिये जाने वाले उधार की दरों में वृद्धि से उपभोक्ताओं के लिये अब ऋण महंगा हो जायेगा। इसका असर देश के उस आम आदमी पर भी पड़ेगा, जो पहले ही चौतरफा महंगाई की दर से जूझ रहा है। उसके आवास व वाहनों के ऋण की ईएमआई बढ़ जायेगी। अब यह मानकर चला जाए कि सस्ते ऋण का दौर अब चला गया है। वहीं सीआरआर यानी नकद आरक्षित अनुपात में .50 फीसदी की वृद्धि की गई है, जो बढ़कर 4.5 फीसदी हो गया है। इससे बैंकों की नगदी पर असर पड़ेगा। जाहिर है केंद्रीय बैंक के इस फैसले के मूल में विश्वव्यापी मुद्रास्फीति में वृद्धि, रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते व्याप्त भू-राजनीतिक तनाव तथा कच्चे तेल की कीमतों में आई अप्रत्याशित तेजी से उपजी चुनौती से निबटने की कोशिश ही है। निस्संदेह, विषम वैश्विक हालात का गहरा असर अन्य विश्व अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत पर भी पड़ा है जिसके मूल में वैश्विक आपूर्ति शृंखला में आया व्यवधान भी शामिल है। लेकिन इस फैसले का असर देश पर नजर आयेगा। शेयर बाजार में गिरावट के अलावा कोरोना संकट के बाद पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करने वाले रियल एस्टेट कारोबार पर भी असर पड़ेगा। अब देखना होगा कि क्या केंद्रीय बैंक के मौद्रिक उपाय महंगाई से जूझते लोगों को कोई राहत दे सकते हैं।

यह सर्वविदित है कि देश में खुदरा व थोक महंगाई में तेजी के बावजूद केंद्रीय बैंक उदार रुख अपनाये हुए था। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि आरबीआई ने कदम उठाने में देरी की है। हाल ही में केंद्रीय बैंक ने कोरोना संकट से देश के उबरने के बाबत आकलन प्रस्तुत किया था। अब उसे लगता है कि वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान का असर घरेलू खाद्यान्नों की महंगाई पर भी पड़ सकता है। अत: पहले से ही रिकॉर्ड बना रही महंगाई पर काबू हेतु रिजर्व बैंक को मौद्रिक उपायों की घोषणा करनी पड़ी है। करीब चार साल बाद महंगाई पर काबू पाने के लिये बैंक ने अंतिम ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया है। बैंक इस बात के संकेत पहले से ही दे रहा था कि नीतिगत दरों के मामले में लचीला रुख ज्यादा समय तक नहीं चल सकता। बहरहाल, इतना तो तय है कि महंगाई पर काबू पाना बैंक की प्राथमिकता रही है। इसके बावजूद महंगाई निर्धारित दायरे का अतिक्रमण कर रही थी। अब देखना होगा कि केंद्रीय बैंक के मौद्रिक उपाय किस हद तक महंगाई पर काबू पाने में कामयाब हो सकते हैं। निस्संदेह महंगाई की उच्च दर कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर डालती है। वह भी तब जब कोरोना संकट से उबरने के लिये सरकार व रिजर्व बैंक लगातार प्रयासरत हैं। विडंबना यह है कि जैसे-जैसे देश कोरोना संकट से उबर कर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कुछ सफलता पाने के करीब था, रूस-यूक्रेन संकट ने उसकी कोशिशों पर पानी फेर दिया। सबसे ज्यादा तो महंगे कच्चे तेल ने देश की मुश्किलों को बढ़ाया है। चिंता की बात यह है कि कहना कठिन है कि रूस-यूक्रेन युद्ध कब तक खत्म होता है। वह स्थिति बेहद चिंताजनक होगी, यदि महंगाई में और तेजी आती है। अब बैंकों द्वारा दिये जाने वाले ऋण भी महंगे होंगे और आर्थिक गतिविधियों पर इसका प्रभाव नजर आ सकता है। लेकिन यह तय है कि नीतिगत दरों में बदलाव के साथ अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने हेतु राजकोषीय व मौद्रिक नीतियों में संतुलन जरूरी है।

सब से अधिक पढ़ी गई खबरें

ज़रूर पढ़ें

योगमय संयोग भगाए सब रोग

योगमय संयोग भगाए सब रोग

जीवन के लिए साझे भविष्य का सपना

जीवन के लिए साझे भविष्य का सपना

यमुनानगर तीन दर्जन श्मशान घाट, गैस संचालित मात्र एक

यमुनानगर तीन दर्जन श्मशान घाट, गैस संचालित मात्र एक