Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

बढ़ेगा गरीबी का दायरा

खाड़ी संघर्ष के असर से बढ़ी महंगाई की मार

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी की पश्चिम एशिया युद्ध से भारत पर पड़ने वाले प्रभावों को उजागर करने वाली रिपोर्ट के निष्कर्ष चिंता बढ़ाने वाले हैं। रिपोर्ट बताती है कि खाड़ी में ईरान-अमेरिकी युद्ध से उपजी परिस्थितियों के चलते भारत में और 25 लाख लोग गरीबी की दलदल में फंस सकते हैं। साथ ही मानव विकास की प्रगति में कुछ कमी आने की आशंका पैदा हो गई है। रिपोर्ट इस बात का भी खुलासा करती है कि पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों में वृद्धि से एशिया प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। रिपोर्ट बताती है कि ईंधन, मालभाड़ा और कच्चे माल की लागत बढ़ने से लोगों की घरेलू क्रयशक्ति घट रही है, जिससे खाद्य असुरक्षा भी बढ़ रही है। वहीं विकास कार्यों के लिए निर्धारित सरकारी बजट पर भी अतिरिक्त दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा आजीविका के अवसर कम हो रहे हैं। इस संकट में जहां पूरे विश्व में 88 लाख लोगों के गरीबी की चपेट में आने की आशंका है, वहीं भारत में यह अनुमानित संख्या 25 लाख है। रिपोर्ट में पश्चिम एशिया में तनाव के चलते एशिया-प्रशांत में तकरीबन 299 अरब डॉलर तक का नुकसान होने की आशंका है। हालांकि, भारत की बड़ी आबादी के सामने बढ़ने वाली गरीबों की संख्या छोटी है, लेकिन इससे भारत में गरीबी की दर बढ़ सकती है, जिसके 35.40 करोड़ होने की आशंका है। दरअसल, आज भी भारत करीब 90 फीसदी तेल जरूरतों के लिए आयात पर आश्रित है। हम कच्चे तेल का 40 फीसदी से अधिक और रसोई गैस का 90 फीसदी आयात पश्चिम एशिया से करते हैं। साथ ही हम अपने उर्वरकों का 40 फीसदी हिस्सा युद्धग्रस्त पश्चिमी एशिया से आयात करते हैं। एलएनजी की कीमतों में वृद्धि से कोयला आधारित बिजली पर हमारी निर्भरता बढ़ी है। वहीं दूसरी ओर व्यापार व आपूर्ति शृंखला भी प्रभावित हुई। आशंका है कि संघर्ष से रेमिटेंस में भी कमी आएगी।

निस्संदेह, मालभाड़ा शुल्क, युद्ध जोखिम बीमा, मार्ग परिवर्तन और देरी की वजह से आयातित तेल आदि की कीमतों में वृद्धि हो रही है, जिससे हमारे आयात मूल्य में वृद्धि व निर्यात का नुकसान बढ़ा है। असर हमारी खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। वहीं खाद की आपूर्ति में बाधा का असर खरीफ की फसल पर पड़ने की आशंका है। इस सब के चलते बढ़े दामों का प्रभाव आम आदमी की जेब पर हो रहा है, जिसका रोजगार और आय के मामले में असर बड़ी आबादी पर नजर आ रहा है। हाल ही में नोएडा और मानेसर में श्रमिक असंतोष को इसकी परिणति के रूप में महसूस किया जा सकता है। दरअसल, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है। आर्थिक परेशानियों के चलते आम आदमी अब अपने जरूरी खर्चों में कटौती कर रहा है। वजह है उसकी आय के साधन सीमित होना। वहीं निम्न आय वर्ग के लोगों में इससे भरण-पोषण का संकट पैदा हो रहा है। श्रमिक असंतोष के बीच आक्रोश उभरा कि महंगाई के अनुपात में उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही, फलत: जीवनयापन कठिन होता जा रहा है। सरकार की ओर से सोमवार को जारी रिपोर्ट में भी स्वीकार किया गया कि मार्च में खुदरा महंगाई बढ़कर 3.4 हो गई है, जिसकी वजह पश्चिमी एशिया से उपजा संकट बताया जा रहा है। सवाल यह है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के प्रयास सिरे क्यों नहीं चढ़ रहे हैं। यदि कदम प्रभावकारी हैं तो फिर महंगाई क्यों बढ़ रही है। वास्तव में खाद्य पदार्थों के दामों में वृद्धि को महंगाई का मुख्य कारण बताया जा रहा है। यद्यपि सरकार की दलील है कि खुदरा महंगाई दर केंद्रीय बैंक की रेड लाइन चार फीसदी से नीचे है। लेकिन वास्तव में स्थिर आय के चलते महंगाई अधिक महसूस की जा रही है। लेकिन लोगों की चिंता यह है कि यदि पश्चिम एशिया संकट का शीघ्र समाधान नहीं निकलता है तो महंगाई की मार असहनीय हो सकती है। यदि समय रहते सरकार की तरफ से ठोस प्रयास किए जाते हैं तो महंगाई पर अंकुश लगाना संभव हो पायेगा।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×