देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली घातक पर्यावरण संकट झेल रही है। विडंबना यह है कि इस संकट के निदान के लिये जो उपाय लागू किए जा रहे हैं, उसका खमियाजा गरीबों को झेलना पड़ रहा है। इस संकट की संवेदनशीलता को महसूस करते हुए सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि अमीरों की जीवन शैली से उपजी मुश्किलों का सामना गरीबों को करना पड़ता है। दरअसल, बिगड़ते प्रदूषण संकट के बाबत दायर याचिकाओं को आज सुनवाई के लिये सूचीबद्ध करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने यह मर्मस्पर्शी टिप्पणी की। कोर्ट ने भरोसा दिलाया कि वह इस बाबत प्रभावी और लागू करने योग्य आदेश पारित करेगा। दरअसल, मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने वरिष्ठ वकील और न्यायमित्र अपराजिता सिंह की दलीलों पर गौर करते हुए ये टिप्पणी की थी। अदालत का कहना था कि दिल्ली एनसीआर में ग्रेप-4 लागू करने के चलते जो पाबंदियां लागू की गई हैं, उनका सबसे ज्यादा नुकसान गरीब लोगों को हो रहा है। इससे निर्माण कार्य बंद होने से हजारों गरीब मजदूरों का चूल्हा नहीं जल सकेगा। मुख्य न्यायाधीश ने इस बाबत कहा कि संपन्न लोगों को अपनी जीवन शैली में बदलाव लाना चाहिए। साथ ही कहा कि हमें समस्या का पता है और इसलिए हम ऐसे आदेश पारित करेंगे, जिनका पालन किया जा सकेगा। कहा कि कुछ निर्देश ऐसे भी हैं, जिन्हें बलपूर्वक लागू किया जा सकता है। जस्टिस सूर्यकांत का कहना था कि महानगरों में लोगों की अपनी अलग जीवनशैली होती है, जिन्हें वे बदलना नहीं चाहते। यही वजह है कि समस्या अमीरी की वजह से होती है, लेकिन झेलना गरीब को पड़ता है। दरअसल, अदालत की सोच रही है कि हमारा परिवेश-पर्यावरण साफ-सुथरा रहे, इसके लिये हम सबको अपने कुछ सुखों का त्याग करना होगा। यह जानते हुए कि पर्यावरण पर आने वाले संकट व प्रदूषित हवा का अमीर-गरीब पर समान असर पड़ता है।
निस्संदेह, देश की शीर्ष अदालत ने देश व समाज की दुखती रग पर ही हाथ रखा है। महानगरों में अमीर तबके की विलासिता के चलते ही पर्यावरण व अन्य संकटों को बढ़ावा मिलता है। महानगरों में लगातार सड़कों का विस्तारीकरण, नए हाइवे निर्माण व ओवर ब्रिज निर्माण के बावजूद जाम व प्रदूषण का संकट कम नहीं हो रहा है। दरअसल, हमने अपनी सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता दी है, लेकिन व्यापक सामाजिक हितों की अनदेखी की है। आमतौर पर एक अकेले व्यक्ति के लिये कारें सड़कों पर दौड़ती रहती हैं। जो न केवल सड़कों में ज्यादा जगह घेरती हैं, बल्कि ज्यादा कार्बन उत्सर्जन करके प्रदूषण को भी बढ़ावा देती हैं। यही वजह है कि आम आदमी सरकार ने अपने कार्यकाल में ऑड-इवन प्रणाली शुरू करने को प्राथमिकता दी थी ताकि सड़कों पर कारों का सैलाब कम किया जा सके। तब बात उठी थी कि एक दिशा में और एक ऑफिस की तरफ जाने वाले लोग कार शेयर करके चलें। विडंबना यह है कि सत्ताधीशों ने दिल्ली में सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट को सशक्त करने को प्राथमिकता नहीं दी। यदि सार्वजनिक परिवहन सस्ता व सहज उपलब्ध होता तो शायद सड़कों पर कारों का दबाव कम होता। हाल के दिनों में संपन्न व मध्यम वर्ग में एसी व अन्य वातानुकूलन उपायों के उपयोग का प्रचलन तेजी से बढ़ा है। इससे जहां प्रदूषण बढ़ाने वाली बिजली की खपत बढ़ी है, वहीं बाहर का तापमान व कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ा है। इसी तरह तमाम अमीरों द्वारा संचालित उद्योगों में उन उपायों का ईमानदारी से पालन नहीं किया गया जो पर्यावरण में प्रदूषण कम करने में सहायक होते हैं। विडंबना यह है कि महानगरों व अन्य शहरों में जहां कुछ इलाकों में पेयजल का संकट बना रहता है, वहीं दूसरे पॉश इलाकों मे लॉन सींचने, कार धोने और स्वीमिंग पूलों के लिये पर्याप्त पानी उपलब्ध रहता है। अकसर कहा जाता है कि कुदरत ने हर व्यक्ति के लिए हवा, पानी व भोजन उपलब्ध कराया है, लेकिन इनके असमान वितरण व अमीरी के दखल के चलते, गरीब के साथ न्याय नहीं हो पाता है। अमीर होना बुरा नहीं है लेकिन उसकी अमीरी की कीमत गरीब को न चुकानी पड़े।

