यह कोई नई बात नहीं है कि पूर्वोत्तर भारत के लोगों के साथ उनकी कद-काठी व संस्कृति को लेकर कहीं शेष देश में अभद्रता की गई हो। यहां तक कि एक बार तो पूर्वोत्तर के एक मुख्यमंत्री प्रेस वार्ता में यह कहते रो पड़े थे कि उन्हें भारतीय तक नहीं समझा जाता है। बीते साल मई में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वोत्तर को ‘हमारे विविधता के राष्ट्र में सबसे विशिष्ट क्षेत्र’ बताया था। लेकिन अफसोस की बात यह है कि बार-बार भारत के इस विशिष्टता वाले पूर्वोत्तर को तरह-तरह से लांछित किया जाता रहा है। विडंबना है कि इन राज्यों के लोग अक्सर नस्लीय भेदभाव का शिकार होते रहे हैं। कुछ समय पूर्व देहरादून में त्रिपुरा के छात्र अंजेल चकमा की हत्या कर दी गई थी। इस घटना के दो महीने से भी कम समय बाद, दिल्ली में अरुणाचल प्रदेश की तीन महिलाओं को उनके पड़ोसियों ने कुत्सित शब्द ‘धंधेवाली’ से संबोधित किया और मोमो बेचने को कहा। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि उन्हें अपने ही देश में, और वह भी देश की राष्ट्रीय राजधानी में बेगाना करार दे दिया गया। विडंबना यह है कि यह अभद्रता किसी झगड़े या आवेश की प्रतिक्रिया नहीं थी बल्कि यह पहचान और जातीयता पर लक्षित हमला था। इस घटनाक्रम के बाद एक व्यक्ति और उसकी पत्नी पर धर्म, जाति व जन्मस्थान आदि के आधार पर कटुता फैलाने के आरोप में मामला दर्ज किया गया है। इसके अलावा अन्य आरोप भी लगाए गए हैं। निस्संदेह, इस दंपति के आपत्तिजनक व्यवहार ने एक गहरे जख्म को ही उजागर किया है, जो ‘सबका साथ, सबका विकास’ की अवधारणा को सिरे से खारिज करने वाली सोच है। साल 2014 में नीदो तानिया की हत्या से लेकर 2025 में अंजेल चकमा की हत्या तक, यह दुराग्रहों का सिलसिला साफ नजर आता है। अक्सर आरोप लगाये जाते रहे हैं कि पूर्वोत्तर के छात्रों व श्रमिकों को उनकी शारीरिक बनावट, खान-पान और भाषा के आधार पर निशाना बनाया जाता है।
यह विडंबना ही है कि कुछ संकीर्ण लोग भारत की समृद्ध विविधता की विरासत का मर्म नहीं पहचानते हैं। किसी राज्य की भौगोलिक स्थिति, जलवायु व सदियों से चली आ रही संस्कृति हमारे रूप-रंग-भाषा व व्यवहार का निर्धारण करती है। कोस-कोस पर भाषा-पानी बदलने वाले देश की यह विविधता इसकी खूबसूरती भी है। इसके मर्म का सम्मान करना व अंगीकार करना हर भारतीय का दायित्व भी है। पर्वतीय इलाकों का परिवेश व जलवायु व्यक्ति के सरल, सहज, सौम्य व्यवहार व कद-काठी का भी निर्धारण करती है। पूर्वोत्तर समाज में स्त्री प्रधान पारिवारिक व्यवस्था तथा सार्वजनिक जीवन में उसकी महती भूमिका को शेष देश के लोगों द्वारा संशय से देखा जाता है। फलत: परस्पर विश्वास की इस सामाजिक व्यवस्था में स्त्री की भूमिका को लेकर नकारात्मक धारणाएं गढ़ ली जाती हैं। यही वजह है कि पूर्वोत्तर के लोगों द्वारा आरोप लगाया जाता कि उनकी महिलाओं को शक की नजर से देखा जाता है और उन पर बिना किसी आधार के अनैतिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप तक लगाए जाते हैं। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने भी क्षेत्रीय पहचान को लेकर किए जाने वाले किसी भेदभाव के प्रति अक्सर चेताया है। निस्संदेह, कालांतर में पैदा होने वाली नस्लीय शत्रुता इस घटनाक्रम का ही एक घिनौना रूप है। हाल ही के दिल्ली प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष है सामाजिक श्रेष्ठता का दावा करना, किसी बड़े राजनेता से संबंध होने का रौब दिखाना और दूसरे को कमतर मान कथित ‘औकात’ के नाम पर उपहास करना। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि यह विशेषाधिकार जताने की भावना और गलत धारणा दर्शाती है कि कुछ भारतीय खुद को दूसरे भारतीयों से श्रेष्ठ मानने का भ्रम पाले हुए हैं। दिल्ली की घटना की तीन पीड़ितों के वकील, जो सिक्किम से आते हैं, ने दो टूक शब्दों में कहा है- ‘हम भी उतने ही भारतीय हैं, जितने कोई और।’ निर्विवाद रूप से प्रत्येक भारतीय को देश में कहीं भी गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है। शासन-प्रशासन द्वारा यह सुनिश्चित करना कि किसी भी नागरिक को इस अधिकार से वंचित न किया जा सके, सही मायनों में भारत में बहुलवाद की वास्तविक परीक्षा भी है।

