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जीवनदायिनी अरावली

फैसले पर रोक से बचेंगी जिंदगी-जमीन

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यह लोकतंत्र की खूबसूरती ही कही जाएगी कि एक वाजिब मुद्दे पर उठी मुखर आवाजों ने देश की शीर्ष अदालत को अपने ही पिछले फैसले पर रोक लगाने को बाध्य किया। अरबों साल पुरानी अरावली पर्वत शृंखला की अव्यावहारिक परिभाषा पर रोक लगाने और नई विशेषज्ञ समिति के गठन के कोर्ट के निर्णय का स्वागत किया जाना चाहिए। निस्संदेह, पिछले फैसले से जनमानस में जो आशंकाएं व भ्रम पैदा हुए थे, नये फैसले से उन्हें दूर करने में मदद मिलेगी। ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव भयावह रूप में हमारे सामने हैं, दिल्ली व राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जानलेवा प्रदूषण की गिरफ्त में हैं और लगातार मरूस्थलीकरण की चुनौती बढ़ रही है, कोर्ट के नये फैसले के दूरगामी परिणाम होंगे। यह देश के पारिस्थितिकी तंत्र संरक्षण के नजरिये से भी एक जरूरी फैसला है। निस्संदेह, विकास जरूरी है, लेकिन करोड़ों सांसों की कीमत पर नहीं। निर्विवाद रुप से यदि अरावली को लेकर पुरानी परिभाषा अमल में आ जाती तो खनन माफिया को इसे नेस्तनाबूद करने का लाइसेंस मिल जाता। पुराना अनुभव बताता है कि खनन के ठेके में सरकारों द्वारा निर्धारित सीमा से कई गुना अधिक खनन किया जाता है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट के इस खेल में माफिया, सत्ता व शासन के कुछ लोगों के अपवित्र गठबंधन के चलते अनर्थ लगातार जारी रहता है। निश्चय ही लोगों के जीवन व पर्यावरण की कीमत पर अनियंत्रित विकास को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। विश्वास किया जाना चाहिए कि शीर्ष अदालत द्वारा नई विशेषज्ञ समिति के गठन के बाद जटिल भू-पर्यावरणीय मुद्दों को बेहतर ढंग से संबोधित किया जा सकेगा। निश्चित रूप से आने वाले समय में खनन की तार्किकता और पर्यावरण पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर पूरे देश के लिये एक जैसी नीति बनाने की जरूरत है। जिससे निकटवर्ती शहरों की आबोहवा तथा भूजल स्तर में सुधार लाने में सफलता मिल सके।

विडंबना ही है कि अरावली की जिस नई परिभाषा को लेकर पर्यावरण संगठन विरोध जता रहे थे, राजस्थान में पिछले दो दशक से उसका अनुसरण किया जा रहा था। इससे अरावली के मूल स्वरूप को कितना नुकसान पहुंचा होगा, उसकी कल्पना कठिन है। वैसे राज्य सरकारों की उदासीनता व खनन माफिया को राजनीतिक संरक्षण के चलते पहले ही अरावली पर्वत शृंखला को भारी नुकसान पहुंच चुका है। बहरहाल, ग्लोबल वार्मिंग के घातक प्रभावों के दौर में विकास व प्राकृतिक संरक्षण के बीच टकराव के मुद्दे को व्यापक मानव हितों में संबोधित करने की जरूरत है। निस्संदेह, नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाने हेतु विकास जरूरी है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों से क्रूरता की कीमत भी लोगों को चुकानी पड़ती है। आखिर वे सुंदर कर्णफूल भी क्या जो कान को क्षतिग्रस्त कर दें? वहीं दूसरी ओर महत्वपूर्ण दायित्व नागरिकों का भी है। वे बड़ी जनसंख्या व क्षेत्र के लिये प्राणदायी व सुरक्षा की इस दीवार को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये सजग भूमिका निभाएं। अरावली क्षेत्र में होने वाले अवैध खनन, वनों के कटान और वन्य जीवों के शिकार से जुड़े मामलों में जिम्मेदार भूमिका का निर्वहन करे। उत्तराखंड का चिपको आंदोलन और राजस्थान में बिश्नोई समाज की सजग-सक्रिय भूमिका पूरी दुनिया में वन-संपदा व वन्य जीवों की रक्षा हेतु मिसाल बन चुकी है। हमें अपनी प्राकृतिक विरासत की रक्षा के लिये आगे आना चाहिए, ये हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिये भी जरूरी होगा। हम आज जल, जमीन व वन संपदा का जिस निर्मम ढंग से दोहन कर रहे हैं, उसके लिये हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। निश्चित रूप से हम ग्लोबल वार्मिंग के पारिस्थितिकी तंत्र व पर्यावरणीय प्रभावों को टाल तो नहीं सकते, लेकिन उसके दुष्प्रभावों को सजगता से कम जरूर कर सकते हैं। यह सुखद ही है कि पर्यावरणवादियों और जागरूक नागरिकों की सजगता-सक्रियता से दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान व गुजरात के लाखों किमी क्षेत्र के लिये प्राकृतिक सुरक्षा दीवार की भूमिका निभाने वाली अरावली का संरक्षण सुनिश्चत हो सकेगा। इसके साथ ही तमाम दुर्लभ वृक्षों, वन्य जीवों व पक्षियों को भी संरक्षण मिल सकेगा। लेकिन इसके बावजूद इससे लगते इलाके में होने वाला किसी भी तरह का हस्तक्षेप नियामक संस्थाओं की कड़ी निगाह में होना चाहिए।

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