यह भारतीय लोकतंत्र की विडंबना ही कही जाएगी कि राजनीतिक दलों ने मुफ्त की योजनाओं को चुनाव जीतने का जरिया ही बना लिया है। मतदाताओं को चंद आर्थिक लाभ व सुविधाएं देकर मुफ्त की रेवड़ियों को सफलता का शॉर्टकट माना जाने लगा है। यही वजह है कि कुछ राज्यों में आसन्न चुनाव से पहले मुफ्त की योजनाओं की संस्कृति के वर्चस्व को देखते हुए देश की शीर्ष अदालत ने तल्ख टिप्पणी की है। जिससे यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श में शामिल हो गया है। उल्लेखनीय है कि अगले दो-तीन महीनों में देश के चार प्रमुख राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु में चुनाव होने जा रहे हैं। हालांकि, लोकतंत्र की कल्याणकारी अवधारणा के चलते लोकहित में चलायी जाने वाली जनहितकारी योजनाएं शासन का अनिवार्य स्तंभ भी रही हैं। लेकिन लक्षित समर्थन और चुनाव पूर्व दिखायी जाने वाली अतिरेक उदारता के बीच अंतर तेजी से धुंधला होता जा रहा है। देश की शीर्ष अदालत ने इस बाबत चेतावनी दी है कि मुफ्त की योजनाओं का अनियंत्रित विस्तार राज्यों के राजकोषीय अनुशासन को कमजोर कर सकता है। निस्संदेह, इस बारे में कोई दो राय नहीं हो सकती है कि राज्यों का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वे विशेष रूप से कमजोर वर्ग के लोगों की खास तौर से देखभाल करें। हालांकि, जब राजस्व घाटे वाले राज्य मुफ्त की योजनाओं पर बड़ी रकम खर्च करते हैं, तो सरकारी खजाने पर दबाव और अधिक बढ़ जाता है। विडंबना यह है कि जिस धनराशि का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं को सक्षम बनाने और शिक्षा की सुविधा को समृद्ध करने के लिये किया जाना चाहिए, वो राशि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिये खर्च कर दी जाती है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि राजनेता मुफ्त की बिजली, मुफ्त बस यात्रा और नकद राशि बांटने की होड़ में शामिल हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोकलुभावनवाद के आगे राजकोषीय विवेक कमजोर पड़ रहा है।
निस्संदेह, देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बाबत तार्किक प्रश्न पूछा है कि राज्य मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के बजाय रोजगार सृजन और कौशल विकास के लिये बजट प्रस्ताव क्यों नहीं पेश करते? इसमें दो राय नहीं कि रोजगार के नये अवसर पैदा करना जन साधारण के सशक्तीकरण का एक स्थायी रूप है। जो लोगों को स्वावलंबी बनाता है। वहीं दूसरी ओर वोटरों को लुभाने के लिये सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों द्वारा लगातार जारी की जा रही मुफ्त की योजनाएं लोगों को अकर्मण्य बना देती हैं। लोग परिश्रम से आर्थिक उपलब्धि हासिल करने के बजाय सरकारी सुविधा पर अधिक निर्भर हो जाते हैं। जरूरत इस बात की है कि कौशल विकास के जरिये लोगों को इस तरह सक्षम बनाया जाए जिससे उन्हें दीर्घकालिक व स्थायी लाभ मिल सकें। निस्संदेह,चुनावी निष्पक्षता के लिये यह आवश्यक हो गया है कि चुनाव से पहले घोषित की गई या लागू की गई लोकलुभावनी नीतियों व योजनाओं की गहन पड़ताल की जाए। विपक्षी दलों द्वारा बिहार सरकार पर आरोप लगाया गया था कि पिछले साल अक्तूबर में आचार संहिता लागू रहने के दौरान मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिला लाभार्थियों को 15,600 करोड़ रुपये दिए गए थे। जो कि स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध कदम था। निर्विवाद रूप से सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों द्वारा इस तरह की सुनियोजित कोशिश विपक्षी दलों को निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा से वंचित करती है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि भारत के निर्वाचन आयोग की ओर से राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को अपरोक्ष रूप से रिश्वत देने के प्रयासों पर पैनी नजर रखी जाए। साथ ही इस दिशा में चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन के रूप में कार्रवाई भी करनी चाहिए। अब चाहे कोई बड़ा राजनीतिक दल इसमें शामिल क्यों न हो। निर्विवाद रूप से चुनाव प्रक्रिया में कोई भी पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाना हमारे जीवंत लोकतंत्र के लिये हानिकारक है। वहीं दूसरी ओर स्वस्थ लोकतंत्र के लिये जरूरी है कि देश का मतदाता परिपक्व व जिम्मेदार नागरिक की तरह व्यवहार करके लोकतांत्रिक मूल्यों को सशक्त बनाने की दिशा में काम करे।

