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सेहत का शिवत्व

आध्यात्मिक उन्नति संग स्वास्थ्य को संबल

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हमारे पर्व, त्योहार व व्रत, जहां सनातन आस्था, ऋतु चक्र और सामाजिक समरसता को संबल देते हैं, वहीं इनका सीधा रिश्ता हमारे स्वास्थ्य संवर्धन से भी जुड़ा है। देश में शिवरात्रि का पर्व ऐसे ऋतु परिवर्तन के सुहाने मौसम में आता है, जब शीत ऋतु विदा ले रही होती है और गुनगुनी धूप में ऊष्मा हमें ऊर्जावान बना रही होती है। सही मायनों में हमारे व्रत-त्योहार हमारी सनातन आस्था को संबल तो देते ही हैं, हमारे मनोकायिक रोगों का उपचार भी करते हैं। इस दिन लोग तनावभरी व मशीनीकृत जिंदगी से इतर शिवालयों में लंबी कतार लगाकर अपने अाराध्य का जलाभिषेक करते हैं। घरों से निकलकर लोगों का आपस मिलना-जुलना होता है। जगह-जगह लगे दूध-फल के भंडारे समाज में दान व समरसता के मानवीय भाव को संबल देते हैं। सही मायने में हम इस दिन कृत्रिमता त्याग सहजता का जीवन जीते हैं। प्रकृति बदलते मौसम के अनुरूप कुछ खास फल भी इसके व्रत के लिए उपलब्ध कराती है, जो हमारे वात, पित्त व कफ को संतुलित करके हमें स्वस्थ बनाते हैं। निस्संदेह, शिवरात्रि आस्था, संयम व साधना का पर्व है। शिव जो संहारक भी हैं तो मानवता के कल्याण के लिए गरल पान करने वाले और धरती पर जीवन देने वाली गंगा का अवतरण करने वाले भी हैं। उनके अनुचर वे जीव-जंतु हैं, जो पारिस्थितकीय संतुलन के लिए बेहद जरूरी हैं। शिवरात्रि आध्यात्मिक उन्नति की रात्रि तो है ही, व्रत के जरिये संयम व साधना का मौका भी देती है। मौसमी बदलाव के दौरान व्रत हमारे पाचनतंत्र को नई ऊर्जा देते हैं।

निस्संदेह, हमारे पर्व व त्योहार तमाम सनातन कथाओं और आस्था की परंपराओं से जुड़े हैं। लेकिन सही मायनों में इनका लक्ष्य श्रद्धालुओं के स्वास्थ्य का संवर्धन करना भी है। हमारे प्रतिष्ठित शिवालय प्रकृति की मनोहारी गोद और जल स्रोतों के निकट स्थित हैं, जहां श्रद्धालुओं को एक प्राकृतिक परिवेश में आध्यात्मिक लाभ के साथ मानसिक शांति भी मिलती है। तीर्थाटन हमारी अर्थव्यवस्था को भी गति देता है। हमारी शारीरिक गतिशीलता और आस्था का उल्लास हमें पूरे दिन एक विशिष्ट ऊर्जा से भर देता है। हम प्रसन्नचित महसूस करते हैं। हर छोटे-बड़े शहर, कस्बे से लेकर गांव में शिव आस्था की अनूठी ऊर्जावान तरंग से हमें एक आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर देती हैं। जो हमारे दैनिक जीवन की एकरसता को खत्म करती है। तमाम वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि प्राकृतिक वातावरण में सहजता और सरलता का व्यवहार हमारे उच्च रक्तचाप को कम करने में खासा मददगार होता है। सही मायने में हमारा कृत्रिम व्यवहार ही तनाव व हाइपरटेंशन का कारक बनता है। हमारे पर्व-त्योहार मंदिरों की लंबी कतारों में ऊंच-नीच, छोटे-बड़े और तमाम तरह के भेद को खत्म करके हमें इंसान मात्र होने का बोध कराते हैं। सहज जीवन स्वस्थ शरीर के लिए अपरिहार्य शर्त भी है। हमारे पूर्वजों ने पर्व-त्योहारों के जरिये मानवता, परमार्थ, समरसता और सहयोग-सामंजस्य के गुण विकसित करके हमारा एक अच्छा इंसान बनने का मार्ग ही प्रशस्त किया है। पर्व-त्योहार व व्रत हमें तमाम सकारात्मक भावों से भर देते हैं।

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