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टैरिफ में राहत

पर व्यापार समझौते में अमेरिकी पलड़ा भारी

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यह सुखद ही है कि अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों पर लगाये गए भारी-भरकम पचास फीसदी टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी कर देने की बात कही जा रही है। दलील दी जा रही थी कि भारत पर रूस से सस्ता तेल खरीदने के एवज में पच्चीस फीसदी अतिरिक्त टैरिफ लगाया गया था। कुछ वैश्विक व्यापार के जानकार मानते हैं कि यह व्यापार समझौते को अमेरिका के पक्ष में लाने के लिये दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा ही था। लेकिन जिसके आगे भारत ने जल्दी से घुटने नहीं टेके थे। अब कहा जा रहा है कि टैरिफ के पचास फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने से भारत ने राहत की सांस ली है। यह भारत के रत्न, आभूषण, वस्त्र और परिधान जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों के लिये सुखदकारी खबर है, जो बीते साल अगस्त में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा टैरिफ बढ़ाने के बाद से ही संघर्षरत रहे हैं। कहा जा रहा है कि लंबे समय से प्रतीक्षित भारत-अमेरिका व्यापार समझौता सिरे चढ़ने के करीब है। आशंका जताई जा रही है कि यह समझौता अमेरिका के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत होता है। हालांकि, इस समझौते से जुड़े व्यापक विवरण का अभी सामने आने का इंतजार किया जा रहा है। कहा जा रहा है कि इस समझौते के तहत भारत अमेरिका से पेट्रोलियम पदार्थ, रक्षा संबंधी उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक्स गुड्स, फार्मास्यूटिकल्स, दूरसंचार से जुड़े उपकरण और विमानों की खरीद बढ़ाएगा। अमेरिका के नीति-नियंता दलील देते रहे हैं कि यह व्यापार समझौता उसके व्यापार घाटे को कम करने और कथित रूप से भारत को ‘अनुचित लाभ’ से वंचित करने की डोनाल्ड ट्रंप की मंशा के अनुरूप ही है। यह समझा जा रहा है कि कहीं न कहीं अमेरिका ने दबाव डालकर भारत को रूसी तेल की खरीद बंद करने के लिये बाध्य कर लिया है। हालांकि, कहा यह भी जा रहा है कि इस प्रक्रिया को पूरा होने में कुछ महीनों का समय लग सकता है। इसी तरह व्यापार बाधाओं को कम करने में भी कुछ वक्त लग सकता है।

वैसे रूस से तेल खरीदने पर रोक के संकेत तब मिलने लगे थे, जब भारतीय पेट्रोलियम रिफाइनरियों ने रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करनी शुरू कर दी थी। वहीं दूसरी ओर रूस से होने वाली कम आपूर्ति से उपजी परिस्थितियों के मुकाबले के लिये भारत ने पश्चिमी एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात बढ़ा दिया था। वैसे इस बाबत चिंता की बात तब उत्पन्न हुई थी जब अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस ने कहा था – ‘व्यापार समझौता अमेरिकी कृषि निर्यात को बढ़ावा देगा, कीमतों में वृद्धि करेगा और अमेरिका के ग्रामीण इलाकों में नकदी का प्रवाह बढ़ाएगा।’ ऐसे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या मोदी सरकार डेयरी और कृषि क्षेत्रों में अमेरिकी उत्पादों के लिये भारत के बाजारों को खोलते हुए घरेलू किसानों के हितों की रक्षा कर पाएगी? यह जानते हुए भी कि भारत में कृषि व किसान राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील मुद्दा है। वैसे इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अमेरिकी राष्ट्रपति के लगातार दबाव व ‘या तो मेरी बात मानो या फिर रास्ता छोड़ दो’ वाले रवैये ने नई दिल्ली को कई रियायतें देने और समझौते करने के लिये मजबूर कर दिया है। निस्संदेह,यह एक हकीकत है कि व्यापार के मोर्चे पर अमेरिका का पलड़ा भारी बना हुआ है। जिससे भारत की सौदेबाजी करने की क्षमता और रणनीतिक स्वायत्तता बनाये रखने की क्षमता को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। अच्छी बात यह है कि भारत के निर्यात प्रतिस्पर्धियों मसलन इंडोनेशिया, वियतनाम और बांग्लादेश आदि पर अमेरिका द्वारा उच्च शुल्क लगाए जा रहे हैं। हालांकि, चिंता इस बात को लेकर भी जतायी जा रही है कि भारत ने ट्रंप को मात देने का एक अवसर खोया भी है। वैसे यह हकीकत किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिका की सारी नीतियां अमेरिका से शुरू होकर अमेरिका पर ही खत्म हो जाती हैं। खासकर ट्रंप के राष्ट्रपति काल में ये नीतियां ज्यादा आक्रामक रूप में सामने आई हैं। जिसका खामियाज उसके मित्र देश भी भुगत रहे हैं।

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