सूरजकुंड शिल्प मेले के दौरान हुए झूला हादसे ने ऐसे आयोजनों की सुरक्षा चिंताओं को गंभीरता से लेने की जरूरत बतायी है। इस अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेले में शनिवार को झूला हादसे में 12 लोग घायल हो गए थे और घायलों को बचाने के प्रयास में हरियाणा पुलिस के जांबाज इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद की मृत्यु हो गई थी। हालांकि, हरियाणा सरकार ने तत्काल कार्रवाई करते हुए झूला संचालक व उसके एक सहयोगी को गिरफ्तार करके गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज किया है। हादसे में मृतक जगदीश प्रसाद को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई, परिवार को आर्थिक सहायता देने के साथ ही एक परिजन को नौकरी देने की घोषणा शासन की तरफ से की गई है। साथ ही हादसे की जांच के लिये तीन सदस्यीय एसआईटी गठित कर दी गई है। लेकिन यह हादसा ऐसे मेलों में एडवेंचर राइड्स को विनियमित करने के लिये व्यापक नीति के निर्माण, सुरक्षा खामियों और जोखिमों से निपटने के लिये एक सुरक्षा ढांचा बनाने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है। सूरजकुंड मेले में विशाल झूले के गिरने से हुए हादसे से देश के विभिन्न भागों में मनोरंजन पार्कों, मेलों और रोपवे सुविधाओं में विगत में हुई कई ऐसी घटनाओं से जुड़े जख्म फिर से हरे हो गए। निस्संदेह, यदि समय रहते सुरक्षा मानकों की कायदे से जांच-पड़ताल की गई होती तो इस तरह की दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होती। घटना ने सबक दिया है कि ऐसे बड़े झूलों को संचालन की अनुमति देने से पहले सुरक्षा उपायों की गहनता से जांच-पड़ताल की जानी बेहद जरूरी है। लेकिन विडंबना यह है कि बड़े झूलों के सुरक्षा संबंधी प्रोटोकॉल महज कागजी कार्यवाही तक ही सीमित रहते हैं। इतना ही नहीं ज्यादातर मामलों में ये केवल स्व-सत्यापित हलफनामे होते हैं, जिनके पालन का आश्वासन मात्र दिया जाता है। हादसा बताता है कि आयोजन से पहले आवश्यक निरीक्षण प्रक्रिया को गंभीरता से नहीं लिया गया। निर्धारित मानकों का पालन न किए जाने पर सख्त दंड का प्रावधान न होने से मानक संचालन प्रक्रियाओं का कोई अर्थ नहीं रह जाता।
वास्तव में झूला संचालकों और अधिकारियों के लिये जिम्मेदारी और जवाबदेही के अनिवार्य मापदंड तय किए जाने चाहिए। एक बार फिर सिद्ध हुआ कि विगत में कई मेलों में हुई घटनाओं से हमने कोई सबक नहीं सीखा। हमें मध्य प्रदेश के झबुआ मेले,दक्षिणी पश्चिमी दिल्ली के मनोरंजन पार्क, वीजीपी यूनिवर्सल किंगडम चेन्नई, कागल मेला, कोल्हापुर, कांकरिया मनोरंजन पार्क अहमदाबाद व पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग रोपवे हादसे से सबक लेना चाहिए। हाल ही में 26 जनवरी को, गुजरात में विनाशकारी भुज भूकंप आने के पच्चीस साल बाद आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधक प्राधिकरण यानी एनडीएमए ने आपदा के बाद सभी हितधारकों की जवाबदेही व भूमिका को लेकर एक विस्तृत दस्तावेज जारी किया था। इन दिशा-निर्देशों में जनशक्ति और प्रशिक्षण की कमी, रसद आपूर्ति संबंधी खामियों और समन्वय एवं नेतृत्व संबंधी समस्याओं जैसी गंभीर खामियों को उजागर किया गया था। इसके साथ ही पीड़ितों की पहचान की प्रक्रियाएं भी सूचीबद्ध की गई हैं। निस्संदेह,एनडीएमए के इस दस्तावेज पर पूरे देश में अनिवार्य रूप से गंभीरता से विचार करने की जरूरत महसूस की जा रही है। साथ ही इसका अनुपालन भी सुनिश्चित किए जाने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत पेशेवरों द्वारा संचालित प्रशिक्षण शिविर, कार्यों का स्पष्ट विभाजन, जन-जागरूकता अभियान चलाना तथा मॉक ड्रिल एक प्रभावी प्रतिक्रिया तंत्र के लिये एक मूलभूत आवश्यकता है। निर्विवाद रूप से देश में आपदा प्रबंधन को एक पेशे और स्वयंसेवी सेवा, यानी दोनों रूप में प्राथमिकता दी जानी चाहिए। निस्संदेह, सूरजकुंड के अंतर्राष्ट्रीय शिल्प मेले में हुई दुर्घटना के बाद हरियाणा सरकार के अधिकारियों ने समय रहते तुरंत कार्रवाई की है। साथ ही सरकार ने भविष्य में ऐसी घटनाएं टालने के लिये सख्ती का रुख अपनाने का वायदा किया है। ऐसे में भविष्य में ऐसी दुर्घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिये आवश्यक प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। यदि सुरक्षा प्रावधानों का अनुपालन शत-प्रतिशत सुनिश्चित किया जाता है तो यह कर्तव्य निभाते हुए शहीद हुए इंस्पेक्टर जगदीश प्रसाद को दी जाने वाली सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

