जीवन की सांझ में बुजुर्गों को अपनों के पास न होने की टीस सालती है। कई बुजुर्गों के बच्चे विदेशों में अपना भविष्य तलाशने गए तो फिर लौटकर नहीं आये। जीवनभर की जमा-पूंजी से बनाये गए बड़े-बड़े घरों में वे सिर्फ दीवारें ताकते हैं। बच्चों के पास जाते भी हैं तो वहां रात-दिन काम में जुटे बच्चों के साथ रहना उन्हें रास नहीं आता। आत्मकेंद्रित होती पीढ़ी भी भारत में रहने वाले माता-पिता की सुध लेने लौटकर तक नहीं आती। ऐसे में साधन-संपन्न बुजुर्ग को कई बड़े शहरों में ऐसी कंपनियां किराये की सतानें उपलब्ध कराती हैं। ये किराये की संतानें बुजुर्गों के साथ सैर पर जाते हैं, लूडो आदि खेल खेलते हैं और उनका एकाकीपन दूर करते हैं। यद्यपि यह समस्या का अंतिम समाधान तो नहीं है लेकिन कुछ समय के लिए वे राहत महसूस करते हैं। दरअसल, बुजुर्गों के जीवन में अंदर से खालीपन इतना बढ़ गया है जिसे भरने के लिए वे किराये की संतानों की ओर उन्मुख होते हैं। कई कंपनियां बुजुर्गों को केयर का पैकेज देती हैं। वे ऐसे अटेंडेंट उपलब्ध कराती हैं जो बुजुर्गों के साथ बैठकर टीवी देखते हैं, ताश खेलते हैं, दिन-भर बातें करते हैं। कंपनियों की यह सुविधा सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रह गई बल्कि गांवों तक लोग इन्हें अनुबंधित कर रहे हैं। हालांकि, खून के रिश्तों का कोई विकल्प नहीं हो सकता है, लेकिन तात्कालिक तौर पर वे इनकी उपस्थिति में कुछ सुकून हासिल कर सकते हैं।
हालांकि, ऐसे दौर में जब उम्र-दराज लोगों के आय के स्रोत सिमटने लगते हैं और शरीर भी साथ नहीं देता तो बहुत से लोगों के सामने किराये की संतान का बोझ उठाना भी मुश्किल होता है। खासकर निजी क्षेत्र के सेवानिवृत्ति कर्मचारियों के लिए जिनकी पेंशन भी मुट्ठी में सिमट जाती है। विकसित देशों में सेवानिवृत्त लोगों के लिए तमाम कल्याणकारी योजनाएं लागू रहती हैं। वे अपनी नौकरी के दौरान पर्याप्त आयकर देते हैं। फिर सेवानिवृत्ति पर सरकारें उनकी देखभाल व मेडिकल सुविधाओं का दायित्व निभाती हैं। भारत में कथित लोककल्याणकारी सरकारें भरपूर आयकर वसूलने के बाद भी जिंदगी की सांझ में बुजुर्गों को उनके हाल पर छोड़ देती है। अपने भी गांठ का धन मजबूत होने पर ही अपने साथ निभाते हैं। ऐसे में बुजुर्गों व वृद्धों का जीवन अवसादमय हो जाता है। लगातार महंगी होती चिकित्सा सुविधाएं और आय के स्रोतों का संकुचन उन्हें भविष्य के भय से भर देता है। वास्तव में बुजुर्गों व वृद्धों को जीवन की सच्चाई को स्वीकार करते हुए इसका मुकाबला करने को तैयार रहना चाहिए। शारीरिक सक्रियता, योग, ध्यान, प्राणायाम व सत्संग उनके लिए मददगार होता है। अक्सर सोशल मीडिया पर चर्चा की जाती है कि यदि अनाथ आश्रमों के बच्चों को ओल्ड ऐज होम के बुजुर्गों के साथ रखा जाए तो दोनों की समस्या हल हो सकती है। एक ओर बच्चों को जहां अभिभावक मिल सकते हैं, वहीं बुजुर्गों को बच्चे मिल सकते हैं। गुणवत्ता वाले सुविधा-संपन्न वृद्धाश्रमों को बनाने के लिए सरकार के स्तर पर बड़े प्रयास करने की जरूरत है।

