Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

सुप्रीम संवेदनशीलता

न्यायिक तंत्र में संवेदना-करुणा को तरजीह

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

भारतीय समाज में किसी भी तरह की हिंसा से पीड़ित महिलाओं के लिये न्याय पाने की प्रक्रिया में न्यायिक तंत्र की विसंगतियों से जूझना कष्टप्रद रहा है। समाज में सोच रही है कि पहले ही हिंसा का शिकार हुई स्त्री द्वारा अपनी आपबीती को बार-बार दोहराना पुन: उसी यंत्रणा से गुजरना जैसा होता है। उसकी अभिव्यक्ति की गोपनीयता व पहचान सुरक्षित रखने की भी जरूरत महसूस की जाती रही है। विडंबना यह भी रही है कि अक्सर स्त्री के खिलाफ हुई हिंसा से जुड़े मामले में सामाजिक धारणाओं पर पितृसत्तात्मक सोच वाली मानसिकता का वर्चस्व रहता है। निर्विवाद रूप से हर तरफ से हारा-हताश व्यक्ति न्याय की चौखट पर अंतिम सहारे के रूप में जाता है। लेकिन कई बार देखने में आया है कि स्त्री के विरुद्ध हुए अपराध के मुकदमे के दौरान टिप्पणियों व फैसले पर पूर्वाग्रहों का असर नजर आता है, जिसे पहले से पीड़ित स्त्री के कष्ट में इजाफा ही होता है। कहा जाता है कि इस प्रक्रिया में यदा-कदा संवेदनशीलता व करुणा का भाव नदारद पाया गया। यही वजह है कि समय-समय पर शीर्ष अदालत ने न्यायाधीशों के निर्णयों को रूढ़िवादिता के प्रभाव से मुक्त करने के लिये प्रयास किए हैं। इसी आलोक में पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को यौन हिंसा व स्त्री से जुड़े अन्य अपराधों के परिप्रेक्ष्य में जजों तथा न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों के लिए संवेदनशीलता तथा करुणा विकसित करने की पहल की है। दिशा-निर्देश तैयार करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति गठित करने के निर्देश दिए हैं। निस्संदेह, इस संवेदनशील पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का यह प्रयास भविष्य में नई लीक बनाएगा, जिसमें न्यायाधीश स्त्री के विरुद्ध यौन हिंसा व अन्य अपराधों के मामलों में संवेदनशीलता के साथ सुनवाई कर सकेंगे। इसके साथ ही संभव हो सकेगा कि उनके फैसलों पर किसी सामाजिक भेदभाव की धारणा व पूर्वाग्रह का असर नजर न आए।

निस्संदेह, इस प्रयास से न्याय को अधिक मानवीय व संवेदनशील बनाने में मदद मिल सकेगी। विगत में भी इस दृष्टिकोण की कमी न्यायिक प्रक्रिया में महसूस की जाती रही है। कई तरह की विसंगतियों को कई फैसलों में महसूस किया जाता रहा है। यही वजह है कि शीर्ष अदालत को न्यायिक प्रक्रिया में संवेदनशीलता विकसित करने की जरूरत पर बल दिया गया। हमारे समाज में न्यायाधीशों को पंच-परमेश्वर की संज्ञा दी गई है और उनसे नीर-क्षीर विवेक के साथ संवेदनशील व्यवहार की उम्मीद की जाती रही है। निश्चित रूप से शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप के बाद न्यायपालिका के नजरिये में बदलाव के साथ न्यायिक प्रक्रिया में निहित संवेदनशीलता का समावेश हो सकेगा। वैसे तो विगत में भी इस दिशा में कई रचनात्मक पहल की गई हैं, लेकिन उनके आशातीत परिणाम सामने नहीं आए हैं। ऐसा ही एक प्रयास साल 2023 में एक पुस्तिका के रूप में सामने आया था, जिसमें फैसलों में पुरुष प्रधान मानसिकता वाली शब्दावली से परहेज करने का सुझाव दिया गया था। इसके साथ ही विगत में न्याय प्रक्रिया से जुड़े लोगों के लिये लैंगिक संवेदनशीलता पर केंद्रित प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने की जरूरत पर बल दिया जाता रहा है। एक अन्य विकल्प के रूप में न्यायपालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने की जरूरत भी बतायी जाती रही है। दरअसल, एक विसंगति यह भी रही है कि देश की निचली अदालतों में महिलाओं से जुड़े यौन हिंसा व अन्य गंभीर अपराधों के मामले में फैसले देते वक्त सामाजिक यथार्थ की अवहेलना की जाती रही है। फलस्वरूप कानूनी प्रावधानों की व्याख्या में चूक से अपराध की प्रकृति कमतर आंकी जाती है। जिससे पीड़ित महिला की न्याय की डगर मुश्किलों भरी हो जाती है। ऐसे में न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों को लैंगिक संवेदनशीलता का पाठ पढ़ाए जाने के बाद पीड़िताओं को वास्तविक न्याय मिल सकेगा। तब न्यायाधीश पितृसत्तात्मक दुराग्रहों से निरपेक्ष रहकर महिला के वास्तविक कष्टों को महसूस करते हुए प्राकृतिक न्याय दे सकेंगे। भारत में 21वीं सदी के उन्नत सामाजिक परिवेश में लैंगिक संवेदनशीलता वाला न्याय एक अपरिहार्य स्थिति है। शीर्ष अदालत के इस दिशा में प्रयास वक्त की जरूरत के अनुरूप ही हैं।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×