Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
search-icon-img
Advertisement

छात्रों का आत्मघात

तनावग्रस्त युवा प्रतिभाओं को खोना राष्ट्रीय क्षति

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान में दो महीनों के दौरान चार छात्रों द्वारा आत्महत्या करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। यह संस्थान ही नहीं, शैक्षिक जगत और उनके परिवारों की भी अपूरणीय क्षति है। घटनाएं तकनीकी संस्थानों में तनाव प्रबंधन और मानसिक उपचार की खामियों को भी उजागर करती हैं। कोई व्यक्ति आत्मघाती कदम तब ही उठाता है जब उसे उम्मीद के सारे दरवाजे बंद नजर आते हैं। इस घातक कदम को उठाने से पहले वो तनाव के चरम से जूझते हुए किस मानसिक कष्ट से गुजरता होगा, अंदाज लगाना कठिन नहीं है। उसकी मन:स्थिति इतनी हताशा से भरी होती है कि आत्महत्या जैसा पीड़ादायक-घातक रास्ता उसे समाधान नजर आता है। विडंबना है कि हम संभावनाओं के इस दुखद अंत को मूकदर्शक बने देखते हैं। हम आत्महत्या के आंकड़ों व संख्या का जिक्र ही करते हैं, लेकिन उसे पाल-पोसकर बड़ा करने वाले मां-बाप पर हुए वज्रपात का अहसास नहीं करते। उच्च तकनीकी संस्थान की दहलीज तक पहुंचने में बच्चे कितना शरीर को गलाते हैं। उन्हें पालने-पोसने व बड़ा करने में मां-बाप अपना खून पसीना एक कर देते हैं। हर बच्चा चांदी का चम्मच लेकर पैदा नहीं होता। उसके इस मुकाम तक पहुंचने में माता-पिता का त्याग शामिल होता है। कई अभिभावक बैंकों से कर्ज लेकर इन तकनीकी संस्थानों में बच्चों का एडमिशन कराते हैं। कई पैरेंट्स इस लायक बनाने के लिये पैसा कोचिंग संस्थानों में बहाते हैं। फिर एक दिन खबर आती है कि उनकी उम्मीदों ने आत्मघात कर लिया। हमें उनके दर्द को अपने दर्द की तरह महसूस करना चाहिए। इन घटनाओं के बाद एनआईटी ने एक पांच सदस्यीय जांच समिति बनायी है। लेकिन क्या समिति उन बच्चों का जीवन लौटा पाएगी? दूसरी ओर राज्यसभा सांसद ज़ॉन ब्रिटास ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री से प्रकरण में तुरंत हस्तक्षेप करने की मांग की है। वहीं एनआईटी ने छात्रों की समस्याओं को दूर करने के लिये कुछ अलग समितियां भी बनायी हैं।

देश के विभिन्न उच्च तकनीकी संस्थानों में छात्रों के आत्मघात की खबरें अकसर आती हैं। कुछ साल पहले शिक्षा मंत्रालय ने संसद को बताया था कि साल 2018-2023 के बीच उच्च शिक्षा संस्थानों के 98 छात्रों ने आत्महत्या की थी। इनमें सबसे ज्यादा सबसे प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान आईआईटी में हुई थी। उसके बाद आत्मघात करने वाले छात्र एनआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों के थे। जाहिर है इन संस्थानों में कुछ तो ऐसा घट रहा है, जिससे हमारी संवेदनशील प्रतिभाएं साम्य नहीं बैठा पा रही हैं। विडंबना यह है कि देश के हर संस्थान व शासन-प्रशासन के स्तर पर आग लगने पर कुआं खोदने की मनोवृत्ति बनी हुई है। इन संस्थानों में पूरे देश की चुनिंदा प्रतिभाएं ही पहुंचती हैं। जो एक गलाकाट स्पर्धा के दौर से गुजरकर यहां तक आती हैं। लेकिन हमारी शिक्षा व्यवस्था का ढांचा ऐसा है जो बच्चों को किताबी कीड़ा तो बनाता है, लेकिन चुनौतियों से जूझने लायक नहीं बनाता। अब वे शिक्षक भी नहीं रहे जो छात्रों के सर्वांगीण विकास को ध्यान में रखकर पढ़ाएं। बड़ी संख्या ऐसे शिक्षकों की है जिनकी प्राथमिकता अपने विषय और वेतन-भत्तों व सुविधाओं तक ही सीमित रह गई है। परवरिश के स्तर पर भी नहीं सिखाया जाता कि जीवन में बुरे से बुरा घटने पर बिना विचलित हुए कैसे उस चुनौती का सामना किया जाए। परिवार की उम्मीदों का बोझ ढोते, ये प्रतिभावान बच्चे जब असफलता के भय से ग्रस्त होते हैं तो आत्महत्या को अंतिम विकल्प के रूप में सोचने लगते हैं। ऐसी घटनाएं होने पर शिक्षण संस्थानों द्वारा फौरी तौर पर जो कदम उठाये जाते हैं, वे कारगर साबित नहीं होते। किसी आत्महत्या का मामला प्रकाश में आने के बाद हाय-तौबा होती है, तब घोषणाएं होती हैं। फिर वही ढाक के तीन पात। तनाव से गुजरते छात्रों पर पैनी नजर रखने की जरूरत होती है। ये बच्चे बेहद संवेदनशील व ईमानदार होते हैं, जो अपने को साबित न कर पाने पर आत्मघात की राह चुन लेते हैं। समय रहते उनकी पहचान करके संस्थान प्रबंधन व अभिभावकों को उनकी मनोवैज्ञानिक सहायता करनी चाहिए। इन प्रतिभाओं को तनाव के दानव का ग्रास बनने से रोके जाने की जरूरत है।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×