फिर भी रहें सतर्क

संक्रमण में गिरावट, वैक्सीन की उम्मीदें

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पिछले दो माह के मुकाबले संक्रमण की दर और मरने वालों की संख्या में गिरावट अच्छा संकेत है। स्वास्थ्य मंत्रालय का यह दावा भी उम्मीद जगाने वाला है कि नये साल की शुरुआत में हमारे पास दो वैक्सीनों के विकल्प होंगे लेकिन इसके बावजूद संकट टला नहीं है। अभी हमें बिना वैक्सीन के जीना है और आसपास वायरस की मौजूदगी है। उस पर चिंता यह कि देश में तीन मामले ऐसे आये हैं, जिनमें मरीजों को ठीक होने के बाद फिर से कोरोना हुआ है। वैसे तो माना जाता रहा है कि संक्रमित व्यक्ति के शरीर में चार माह तक संक्रमण से लड़ने वाले एंटीबॉडीज रहते हैं। इस बाबत आईसीएमआर ने कहा है कि दुबारा संक्रमित होने की समय सीमा सौ दिन के बाद तक हो सकती है। कोविड-19 पर मंत्री समूह की बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने आने वाले त्योहारों और ठंड के मौसम को लेकर सचेत किया है कि लापरवाही से संक्रमण बढ़ सकता है। ओणम त्योहार के दौरान बरती गई लापरवाही से कोरोना से बेहतर लड़ाई के लिये प्रशंसा बटोर रहे केरल में अप्रत्यशित रूप से कोरोना का संक्रमण बढ़ा है। बहरहाल, देश में संक्रमण के बाद ठीक होने वालों का आंकड़ा करीब 87 फीसदी है जो दुनिया में सबसे ज्यादा बताया जा रहा है। मृत्यु दर भी गिरकर 1.5 फीसदी हुई है। यह अच्छी बात है कि पिछले करीब एक हफ्ते से संक्रमितों की संख्या नौ लाख से कम है। दो माह में पहली बार संक्रमण और मरने वालों की संख्या में कमी देखी जा रही है, मगर संक्रमण का खतरा टला नहीं है। यूरोपीय देशों में भी लापरवाही के बाद कोरोना की दूसरी लहर आई है। वहां फिर से सख्ती बरती जा रही है। जरूरी है कि कोविड-19 से जुड़े प्रोटोकोल का उल्लंघन न किया जाये। दुर्गा पूजा, दशहरा और दीवाली की तैयारी को देखते हुए सतर्कता की जरूरत है।

इस संकट के बीच हमारे शिक्षा क्षेत्र की विडंबनाएं दीर्घकालीन घातक प्रभावों की आशंकाएं पैदा कर रही हैं। लॉकडाउन के बाद छह माह स्कूल-कालेज बंद रहे हैं। अब जब सरकार ने स्कूल-कालेज खोलने की चरणबद्ध प्रक्रिया शुरू की भी है तो संक्रमण के भय के चलते अभिभावक बच्चों को स्कूल भेजने से कतरा रहे हैं। परंपरागत शिक्षा के नाम पर जिस ऑनलाइन शिक्षा पद्धति का सहारा लिया गया, वह एकांगी है और परंपरागत शिक्षा का विकल्प नहीं बन सकती। फिर कंप्यूटर, लेपटॉप और स्मार्ट फोन तक सीमित वर्ग की पहुंच है। इसमें भौगोलिक व आर्थिक जटिलताएं नकारात्मक भूमिका निभाती हैं। निस्संदेह देश की एक पीढ़ी की दक्षता को दीर्घकालीन नुकसान हो सकता है। पूर्णबंदी के चलते जहां बच्चों का पढ़ाई में रुझान कम हुआ है, वहीं वे पिछला हासिल भी गंवा रहे हैं। विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट चौंकाती है कि शिक्षण संस्थाओं के बंद होने से पढ़ाई के अलावा देश को चालीस अरब डालर का नुकसान होगा। यह बड़ा नुकसान है, जिसका अनुमान नहीं लगाया गया और जिसकी भरपाई में वर्षों लग जायेंगे। रिपोर्ट में यह भी आशंका जतायी गई है कि इस संकट के बीच करीब 55 लाख बच्चे स्कूल छोड़ सकते हैं। निश्चय ही यह देश की बड़ी क्षति है और शिक्षा की अनिवार्यता को लेकर चलाये गये तमाम अभियानों की सार्थकता को विफल बनाती है जो आर्थिक नुकसान के अलावा एक बड़ा नुकसान है। दरअसल, लॉकडाउन के चलते बच्चों की सीखने की क्षमता का ह्रास हुआ है। पढ़ाई के प्रति अरुचि उत्पन्न हुई है क्योंकि घर में स्कूलों जैसा पढ़ाई का वातावरण संभव नहीं है। जीवन पर संकट इतना बड़ा है कि अभिभावक भी चाहकर कुछ नहीं कर सकते। विडंबना यह है कि कोरोना संकट के भय के चलते सरकार द्वारा अनलॉक के प्रयासों के बावजूद शिक्षा व्यवस्था पटरी पर नहीं लौट पा रही है। अभिभावक संतुष्ट नहीं हो पा रहे हैं कि बचाव व सुरक्षा के उपाय स्कूलों में पर्याप्त हो सकते हैं। इसके बावजूद एक पीढ़ी की प्रतिभा बचाने के लिये व्यापक रणनीति बनाने की जरूरत है।

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