गति और सावधानी

फाइव-जी सुविधा से आर्थिकी को संबल

गति और सावधानी

निस्संदेह, आधुनिक युग में इंटरनेट से जुड़ी सुविधाएं हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी हैं। ऑनलाइन खरीददारी, बिलों का भुगतान, टिकटों की खरीददारी से लेकर पढ़ाई तक इस पर निर्भर है। यहां तक कि कोरोना संकट ने टेलीमेडिसिन जैसी सुविधा की अपरिहार्यता को बताया। लेकिन इंटरनेट की धीमी गति हमेशा से इन सुविधाओं की गुणवत्ता में बाधक बनती रही है। अब पांचवीं पीढ़ी की इंटरनेट सेवा 5-जी की नीलामी को केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने से न केवल इन सुविधाओं का विस्तार होगा बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी। अब केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बहुप्रतीक्षित फाइव-जी स्पेक्ट्रम नीलामी की प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी है। अनुमान है कि सरकार को 4.3 लाख करोड़ रुपये की उपलब्धि हासिल होगी। निस्संदेह देश में कुल फोन का 98 प्रतिशत हिस्सा वायरलेस फोन का है, जिन्हें फाइव-जी अल्ट्रा हाई स्पीड इंटरनेट बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करायेगा। अब तक अनिश्चित नेट स्पीड व कनेक्टिविटी की समस्या से उपभोक्ता दो-चार रहे थे। ऐसे वक्त में जब पेशेवर कार्यों, शैक्षणिक व सामाजिक तथा मनोरंजन क्षेत्र में इंटरनेट गति अपरिहार्य हो चली है, फाइव-जी तकनीक का आना सुखद ही है। निस्संदेह, अब सरकार व टेलीकॉम कंपनियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि इस बदलाव को कैसे सुचारू रूप से अंजाम दिया जाये। सबसे बड़ी जरूरत इस बात की है कि फाइव-जी तकनीक की नीलामी को निष्पक्ष व पारदर्शी ढंग से अंजाम दिया जाये। विगत में दो-जी स्पेक्ट्रम की नीलामी में जो कदाचार के आरोप लगे थे, उसने देश में बड़ा राजनीतिक भूचाल खड़ा कर दिया था। जो कालांतर राजनीतिक नेतृत्व परिवर्तन का वाहक बना। कैग के अनुसार, दो-जी स्पेक्ट्रम के कथित घोटाले से पौने दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान सरकार को हुआ। साथ ही दूरसंचार के क्षेत्र में भारत की अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाई। निस्संदेह, ऐसी तमाम अनियमितताओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिये सावधानी पूर्वक कदम उठाये जाने चाहिए। वहीं विवाद का एक मुद्दा बड़ी तकनीकी फर्मों द्वारा दूरसंचार कंपनियों से लीज पर अपने निजी गैर-सार्वजनिक नेटवर्क के लिये फाइव-जी स्पेक्ट्रम लेने की अनुमति से जुड़ा भी है।

निस्संदेह, पांचवीं पीढ़ी के इंटरनेट को मंजूरी मिलना देश की तरक्की से जुड़ा महत्वपूर्ण निर्णय है लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां अपनी लागत का प्रबंधन कैसे करती हैं। वे कैसे अपने संसाधनों का विस्तार करती हैं ताकि उपभोक्ता को बेहतर सिग्नल व तीव्र गति की इंटरनेट सुविधा मिल सके। सवाल केवल सस्ते डेटा का ही नहीं है बल्कि नेटवर्क की गुणवत्ता ज्यादा मायने रखती है। निस्संदेह, फाइव-जी प्रेरित डिजिटल सशक्तीकरण से देश की विकास दर को भी अपेक्षित गति मिल सकेगी जिसके चलते हम एक ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं। यह एक हकीकत है कि जैसे-जैसे हमारी निर्भरता डिजिटल व्यवस्था पर बढ़ती गई है गति वाले इंटरनेट सुविधा की मांग भी बढ़ने लगी है। अब महज सूचना व मनोरंजन ही नहीं, हमारे दैनिक जीवन की तमाम सुविधाएं बेहतर संचालन के लिये तीव्र इंटरनेट सुविधा की मांग करती हैं। कोरोना संकट के दौरान ऑनलाइन शिक्षा की अपरिहार्यता को हमने गहरे तक महसूस किया। लेकिन दूरदराज के क्षेत्रों में धीमी इंटरनेट सुविधा से छात्रों को होने वाली परेशानी को भी देखा गया। यहां तक कि कोरोना काल में इंटरनेट आधारित चिकित्सा सुविधाओं को भी पर्याप्त विस्तार मिला। निस्संदेह, सरकार डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के जरिये घर-घर तक इंटरनेट सुविधा पहुंचाने के लक्ष्य के करीब पहुंचती दिखी। भले ही देश में चौथी पीढ़ी की इंटरनेट सेवा अधिकांश क्षेत्रों में विस्तार पा चुकी है, लेकिन धीमी इंटरनेट सुविधा के चलते पर्याप्त लक्ष्य हासिल नहीं हो पाये हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि फाइव-जी इंटरनेट सुविधा के चलते उन तमाम खामियों को दूर किया जा सकेगा। बेहतर होगा कि आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्यों को हासिल करने के लिये पांचवीं पीढ़ी के इंटरनेट से जुड़े उपकरणों का निर्माण तेजी से देश में किया जा सके ताकि हमारी चीन व अन्य देशों पर निर्भरता कम हो और दुर्लभ विदेशी मुद्रा की भी बचत हो सके।

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