हाल के दिनों में बाजारों में चीनी की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है। वहीं चीनी की कालाबाजारी की आशंका के मद्देनजर सरकार ने इसकी बिक्री का नियमन भी किया है। साथ ही सरकार ने बिना टैक्स दस लाख टन कच्ची चीनी के आयात की इजाजत देने का भी फैसला किया है। लेकिन सरकार का यह फैसला शायद ही बढ़ती कीमतों का जवाब हो। निस्संदेह, यह परिदृश्य सरकार के लिये उसकी महत्वाकांक्षी इथेनॉल नीति की असलियत को समझने का एक अवसर भी है। पूरे देश में इथेनॉल मिश्रित ई-20 पेट्रोल की बिक्री व्यवस्था लागू करने का जश्न मनाने के दो साल से भी कम समय में सरकार अब दो परस्पर विरोधी जरूरतों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। पहला, देश की विदेशी मुद्रा बचाने के लिये कच्चे तेल के आयात को कम करना और दूसरा उपभोक्ताओं के लिये सस्ती चीनी उपलब्ध कराना। निस्संदेह,यह घटनाक्रम एक नीतिगत दुविधा को तो दर्शाता है कि जब एक ही फसल का इस्तेमाल खाद्य पदार्थ और ईंधन, दोनों के लिये किया जाता है, तो किसी एक लक्ष्य को दूसरे से अलग रखकर पूरा नहीं किया जा सकता है। निस्संदेह, ऐसे वक्त में जब खाड़ी संकट के चलते पूरी दुनिया में पेट्रोलियम पदार्थों का संकट व्याप्त रहा, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल ने देश के नागरिकों व सरकार को बड़ी राहत दी है। इसमें दो राय नहीं कि निर्धारित समय सीमा से पहले ही बीस फीसदी इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का लक्ष्य हासिल करके, भारत ने आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को कुछ कम जरूर किया है। वहीं दूसरी ओर सरकार की इस अभिनव पहल से जहां एक ओर चीनी मिलों को सहारा मिला है,वहीं गन्ना किसानों के लिये कमाई का एक अतिरिक्त जरिया भी बना है। निश्चित रूप से उस देश के लिये यह एक उपलब्धि ही कही जा सकती है जो अपनी जरूरतों के लिये 85 फीसदी कच्चे तेल का आयात करता रहा है। वह भी अपने देश में उपलब्ध वैकल्पिक संसाधनों के जरिये।
इसके बावजूद राजग सरकार की इस रचनात्मक पहल की कुछ बुनियादी खामियां भी हमारे सामने उजागर हुई हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि गन्ना भारत में सबसे ज्यादा पानी की खपत करने वाली फसलों में से एक है। वहीं दूसरी ओर इथेनॉल के उत्पादन के लिये गन्ने का इस्तेमाल ऐसे समय में शुरू हुआ है जब देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में शुमार महाराष्ट्र और कर्नाटक में पैदावार खराब मौसम और गन्ने की फसल पर लगी बीमारियों के चलते कमजोर रही है। यह भी एक वजह है कि गन्ना आपूर्ति में आई कमी के चलते भी हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में तेजी देखी गई है। जिसके चलते सरकार को चीनी का निर्यात रोकना पड़ा है। इतना ही नहीं, सरकार को आसन्न त्योहारी मौसम को देखते हुए अब कच्ची चीनी के आयात को अनुमति देनी पड़ी है। निस्संदेह, इन परिस्थितियों के मद्देनजर यह नहीं कहा जा सकता कि देश में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का प्रयोग विफल हो गया है। बल्कि यह समझने की जरूरत है कि देश की कृषि संबंधी वास्तविकताओं और दुनिया की सबसे बड़ी आबादी की खाद्य जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आज जरूरत इस बात की है कि देश में एक लचीली जैव ईंधन रणनीति को तार्किक बनाया जाए। जिसे फसलों की स्थितियों और घरेलू खाद्य जरूरतों के अनुरूप ढाला जा सके। निस्संदेह, फसलों के अवशेष और कृषि अपशिष्ट से निर्मित होने वाले इथेनॉल में अधिक निवेश करने से ही गन्ने पर निर्भरता को कम किया जा सकता है। इसके साथ ही जलवायु लक्ष्यों को भी बढ़ावा दिया जा सकेगा। भारत द्वारा ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोत के लक्ष्य के रूप में कामयाबी एक सराहनीय उपलब्धि कही जा सकती है। निस्संदेह यह उपलब्धि खाद्य मुद्रास्फीति या जल के अंधाधुंध दोहन की कीमत पर नहीं हासिल की जा सकती। सही मायने में सबसे अच्छी नीति वही मानी जाएगी, जो ईंधन के टैंक और रसोई के भंडार पर्याप्त मात्रा में भरा रख सके।

