देश के बहुचर्चित ‘हनीमून मर्डर’ केस की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने आधुनिक जीवनशैली से पारिवारिक विघटन पर जो गंभीर टिप्पणी की, मानो उसने भारतीय समाज की दुखती रग पर हाथ रख दिया। सोनम रघुवंशी मामले में मेघालय सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की बेंच ने गंभीर टिप्पणी की कि आज पति-पत्नी के रिश्तों में भरोसा कम हो रहा है। पहले संयुक्त परिवार रिश्तों को संभालते थे। संयुक्त परिवार इंसान को निराशा सहना और एडजस्ट करना सिखाते थे। लेकिन आज छोटे परिवारों की व्यवस्था के कारण पुरुषों व महिलाओं में डिप्रेशन बढ़ रहा है। लोग छोटी-छोटी बातों में चिढ़ने लगते हैं। गैजेट्स की लत ने इस संकट को और बढ़ाया है। जस्टिस सुंदरेश ने तो यहां तक कहा कि आज बच्चा किसी बात पर जरा रो दे, माता-पिता उसे मोबाइल थमा देते हैं। निस्संदेह, भावनाओं का विकल्प कभी गैजेट्स नहीं हो सकते। धीरे-धीरे बच्चों को इस मोबाइल की लत लग जाती है। उनकी एकाग्रता भंग होने लगती है। भले ही अदालत के समक्ष एक संगीन अपराध का मामला था, लेकिन उसने उस गंभीर संकट के मर्म पर चोट की है, जिससे आए दिन परिवार बिखराव की दहलीज पर खड़े नजर आते हैं। विडंबना देखिए कि जिस भारतीय समाज में ‘तलाक’ के लिये कोई शब्द ही नहीं था, वहां अदालतों में रिश्तों को तोड़ने वालों की भीड़ लगी है। यहां तक कि एक बार अदालत को कहना पड़ा कि पारिवारिक झगड़ों के कारण महत्वपूर्ण कानूनी मामलों पर दबाव बढ़ रहा है। एक समय था कि पश्चिमी जगत में भारतीय परिवार संस्था की सार्थकता व समृद्ध परंपराओं की दुहाई दी जाती थी। लेकिन आज उसी भारत ने पश्चिमी समाज का अंधानुकरण करके एकल परिवार को जीवन का लक्ष्य बना लिया है। जिसके चलते लाखों परिवार संक्रमणकालीन दौर से गुजर रहे हैं। जिससे पारिवारिक संस्था संकटों से जूझ रही है।
हाल के दिनों में विवाह से ठीक पहले और विवाह के ठीक बाद के, कई वीभत्स हत्याकांड सामने आए हैं, जिन्होंने हर संवेदनशील व्यक्ति को झकझोरा है। निर्मम हत्या करने वाली महिला के पति व मंगेतरों के पास प्रतिष्ठा, अचल संपत्ति व बैंक बैलेंस की कोई कमी नहीं थी। निस्संदेह, धन-सपंदा व भारी चमक-दमक से जीवन का सुख नहीं खरीदा जा सकता। संत कबीरदास ने सदियों पहले कह दिया था कि… जब आए संतोष धन सब धन धूरि समान। तभी तो तमाम समृद्धि व विलासिता के साधनों के बावजूद लोग खुश नहीं हैं। ऐसे में घातक कदम उठाने वाले महिलाओं व पुरुषों की परवरिश में भी कहीं न कहीं कोई कमी जरूर रह गई है। पहले साझे परिवारों में दादा-दादी या नाना-नानी, अपने जीवन के कठिन अनुभवों व नफे-नुकसान से हासिल ज्ञान से बेटे-बेटियों व पोते-पोतियों को सीख देते थे। जीवन मूल्यों की कहानियां सुनाया करते थे। संयुक्त परिवार में माता-पिता को किसी अप्रत्याशित झटके झेलने वाला सुरक्षा कवच माना जाता था। दुख-दर्द का मुकाबला साझे रूप में करने से वह कम महसूस होता था। घर की सुरक्षा बनी रहती थी। बूढ़ी मां भले ही शारीरिक रूप से अक्षम होती, लेकिन भरोसा बना रहता था कि घर में मां तो है। पिता तो हैं। अब जब पति-पत्नी असीमित इच्छाओं की पूर्ति के लिये काम पर चले जाते हैं तो घर किसके सहारे रहे? बच्चा किसके भरोसे रहे? कामवाली के? जो चंद पैसों के लिये घर में काम करने आती है। जो वहां आकर अपने घर के अभावों व दुख की तुलना इस घर की समृद्धि से करती है। वही घर के बच्चे की देखभाल के साथ अपने संस्कार भी देती है। दरअसल, आज परिवार में रिश्तों से बड़े अहम् हो गए हैं। इगो का टकराव अकसर रिश्तों के बिखराव की वजह बनता है। कोई झुकने को तैयार नहीं होता है तो परिवार को टूटने से कौन रोकेगा? जाहिर है जो बात पति-पत्नी के बीच नहीं बनी, वो कोर्ट-कचहरी में क्या बनेगी? अलगाव का त्रास मनमुटाव से ज्यादा भयावह होता है। तभी तो अदालतों में तलाक की अर्जियों की संख्या दिन-दुगनी और रात चौगुनी गति से बढ़ रही है।

