देश भर में वोटर लिस्टों में संशोधन के उद्देश्य से चलाये जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी एसआईआर आज प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों से कड़ी जांच के दायरे में हैं। करोड़ों नागरिकों को वोट देने के अधिकार से वंचित करने के आरोप भी लगे हैं। राजनीतिक प्रतिरोध मुखर होने के बाद अब भारत के चुनाव आयोग ने राज्यों के चुनाव अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे उन इलाकों में छूट गए और नये वोटरों को शामिल करने के लिये विशेष अभियान चलाएं, जहां लिस्ट में सुधार का काम पूरा हो चुका है। निस्संदेह, स्पेशल इंटेंसिव रिविजन का दायरा बहुत बड़ा है। देश में आजकल इसका तीसरा चरण चल रहा है। जिसके चलते छात्रों की पढ़ाई में आ रहे व्यवधान से समस्या जटिल हो गई है। देश में बड़ी संख्या में बूथ लेवल ऑफिसर यानी बीएलओ सरकारी स्कूलों के शिक्षक हैं। जिनके एसआईआर में लगे होने के कारण छात्रों की पढ़ाई पर खासा प्रतिकूल असर पड़ रहा है। मसलन, कर्नाटक में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के छात्र मिड-टर्म परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाए हैं। वजह स्पष्ट है कि उनके शिक्षक पिछले तीन महीनों से स्पेशल इंटेंसिव रिविजन के कार्य में ड्यूटी कर रहे हैं। जिसके चलते नियमित कक्षाएं नहीं चल पायी हैं। इसी तरह महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली से भी ऐसी ही व्यवधान की खबरें आ रही हैं। दरअसल, शिक्षक अपना काफी समय वोटर वेरिफिकेशन, मीटिंग और आंकड़े जुटाने में लगा रहे हैं। बताते हैं कि मुंबई के एक स्कूल के 34 में से 24 शिक्षक बीएलओ की ड्यूटी कर रहे हैं। ऐसे में अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि छात्रों की पढ़ाई किस हद तक प्रभावित हो रही होगी। इसमें दो राय नहीं है कि पारदर्शी लोकतंत्र के लिये वोटर लिस्ट में सुधार करना निश्चित रूप से जरूरी है। मकसद यही है कि कोई योग्य वोटर न छूट जाए।
यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि देश के सरकारी स्कूल पहले से ही अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता और पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में छात्रों के दाखिले प्रभावित हो रहे हैं। बताते हैं कि देश में करीब एक लाख स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। वहां छात्रों की पढ़ाई का स्तर क्या होगा, इस बात का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे वातावरण में सवाल यह है कि आने वाले दिनों में छात्रों की पढ़ाई को प्रभावित किए बिना एसआईआर का कार्य किया जा सकता है? निस्संदेह, स्पेशल इंटेंसिव रिविजन का कार्य अपने आप में लोकतंत्र में पारदर्शिता के मद्देनजर एक महत्वपूर्ण कार्य है। लेकिन वहीं दूसरी ओर एक तथ्य सर्वविदित भी है कि ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ की धारा 27 शिक्षकों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा अन्य कामों में लगाने से रोकती है। लेकिन इसके साथ ही चुनाव प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण कामों, जैसी कुछ खास स्थितियों में इसकी इजाजत दी जा सकती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले दिनों इस बात पर बल दिया है कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन के काम को शिक्षकों पर असहनीय बोझ नहीं बनने दिया जाना चाहिए। साथ ही कहा कि तुरंत इस स्थिति में सुधार करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। आने वाले दिनों में जब शिक्षक नियमित रूप से क्लास लेने लगेंगे तो नये सिरे से स्कूलों में छात्रों की पढ़ाई को सामान्य बनाया जा सकता है। हमें यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि पिछले महीनों में एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान छात्रों की पढ़ाई का जो भी नुकसान हुआ है, उसकी अविलंब भरपाई की जानी चाहिए। यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान पढ़ाई में पैदा हुए व्यवधान से छात्रों का कोई बड़ा नुकसान न हो। दरअसल, वोटर लिस्ट की विश्वसनीयता बनाये रखना और बिना रुकावट शिक्षा का अनवरत जारी रहना, दोनों ही जनता के प्रति हमारी बड़ी जिम्मेदारी है। इसका एक निष्कर्ष यह भी है कि भारत को भरोसेमंद वोटर लिस्ट तैयार करने और सुचारु रूप से चल रही क्लास के बीच, किसी एक को चुनने की स्थिति में नहीं होना चाहिए। यह स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।

