गाल बजाते राजनेता और लोक कल्याणकारी होने का दावा करती सरकारों की नाक के नीचे सरकारी अस्पतालों की कैसी बदहाली है, ये किसी से नहीं छिपा है। लोकलुभावन कार्यक्रमों पर पैसा पानी की तरह बहाने वाली सरकारों व मंत्रियों की प्राथमिकताओं में, वे सरकारी अस्पताल कभी नहीं रहे हैं, जो गरीबों व साधनविहीन लोगों का अंतिम आश्रय होते हैं। कायदे से तो सरकारों को इस मुद्दे को प्राथमिकता मानते हुए तत्काल प्रभाव से अस्पतालों की दशा सुधारनी चाहिए। लेकिन विडंबना है कि हर बार न्यायालय को ही जनहित से जुड़े मुद्दों पर सख्ती दिखाकर सरकारों को कार्रवाई करने को कहा जाता है। एक बार फिर पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश से पंजाब तथा हरियाणा सरकारों की सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के संचालकों को एक बेहद जरूरी झटका लगा है। हाईकोर्ट ने दोनों राज्यों को निर्देश दिए हैं कि प्रत्येक जिला अस्पताल में आईसीयू सुविधाओं के साथ-साथ सीटी स्कैन और एमआरआई मशीनों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। निश्चित रूप से न्यायालय के इस तरह के सकारात्मक हस्तक्षेप से स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सत्ताधीशों के वायदों और उनके क्रियान्वयन के बीच बढ़़ती खाई ही उजागर होती है। वहीं अदालत की कार्यवाही के दौरान पंजाब सरकार की ओर से न्यायालय को सूचित किया गया कि राज्य के 23 जिलों में से केवल छह जिला अस्पतालों में ही एमआरआई की सुविधा उपलब्ध है। दूसरी ओर राज्य के अस्पतालों में दो हजार से अधिक जनरल मेडिकल ऑफिसरों के पद और अन्य सैकड़ों विशेषज्ञों के पद खाली पड़े हुए हैं। वहीं कई जिलों के सरकारी अस्पतालों में कार्यशील आईसीयू की कमी है। अदालत ने हरियाणा सरकार से भी गहन देखभाल व निदान सुविधाओं की कमियों को लेकर स्पष्टीकरण मांगा है। निस्संदेह, इन खामियों से फिर उजागर हुआ है कि अनेक सरकारी अस्पतालों में महंगे चिकित्सा उपकरण अक्सर बिना इस्तेमाल के या कम उपयोग में क्यों रहते हैं। वहीं दूसरी ओर विभाग के उच्च अधिकारियों द्वारा भी गरीब व जरूरतमंद मरीजों की तात्कालिक जरूरतों को अनदेखा ही किया जाता है।
न्यायालय की इस बात से बिल्कुल सहमत हुआ जा सकता है कि मौजूदा दौर में सीटी स्कैन,एमआरआई और आईसीयू तक मरीजों की पहुंच विलासिता नहीं, बल्कि बुनियादी स्वास्थ्य सेवा की आवश्यकता बन गई है। जो इस बात पर भी बल देता है कि सरकारें जिला स्तरीय क्रियाशील बुनियादी ढांचा बनाने के बजाय अनिश्चित काल तक आउटसोर्सिंग या रेफरल प्रणालियों पर निर्भर नहीं रह सकती हैं। वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली केवल खरीद की कमी से ही नहीं, बल्कि बिना योजना के भारी-भरकम खरीद की प्रवृत्ति से भी ग्रस्त है। वहीं दूसरी ओर अकसर तकनीशियनों की अनुपलब्धता से एमआरआई मशीनें स्थापित नहीं हो पाती हैं। वहीं अनुबंध समाप्त होने के कारण अक्सर वेंटिलेटर धूल खाते रहते हैं। दूसरी तरफ रेडियोलॉजिस्ट और बायोमेडिकल इंजीनियरों की अनुपस्थिति के कारण निदान सेवाओं को आउटसोर्स किया जाता है। बार-बार की गई ऑडिट रिपोर्टों से पता चलता है कि सरकारी अस्पतालों में करोड़ों रुपये के जीवन रक्षक उपकरण महीनों से लेकर वर्षों तक बेकार ही पड़े रहते हैं। जिसका खमियाजा जरूरतमंद मरीजों को उठाना पड़ता है। किसी भी अस्पताल में एक खराब सीटी स्कैनर की वजह से दुर्घटना पीड़ितों, कैंसर के मरीजों और हृदयाघात के रोगियों के उपचार में देरी होती है। दूसरी ओर सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टरों का हर एक खाली पद कमजोर वर्ग के लोगों को महंगे निजी अस्पतालों में उपचार के लिये धकेल देता है। यह विडंबना ही है कि दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों के मरीज अक्सर लंबी दूरी तय करके सरकारी अस्पतालों तक पहुंचते हैं। अक्सर देखा जाता है कि उन्हें या तो मशीनें काम न करने वाली मिलती हैं या चलाने वाले कर्मचारी नहीं मिलते। निर्विवाद रूप से केवल मशीनें लगाने से ही मरीजों की समस्या का समाधान नहीं हो जाता। सही मायनों में सरकारी अस्पतालों में उपकरणों की उपलब्धता के साथ ही डॉक्टरों, तकनीशियनों आदि की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी ही चाहिए। वास्तव में किसी भी स्वास्थ्य सेवा का मूल्यांकन खरीदी गई महंगी मशीनों से नहीं, बल्कि सही समय पर उपचार का लाभ पाने वाले मरीजों की संख्या से होता है।

