बीमारी का खाना

परंपरागत भोजन में सेहत का खजाना

बीमारी का खाना

जिस बात को हमारे बड़े-बूढ़े लोग अक्सर दोहराते थे कि घर के खाने में सेहत की बरकत होती है, उसी बात को अब ऐलोपैथी के विशेषज्ञ भी दोहरा रहे हैं। लंबे समय से देश के प्राकृतिक चिकित्सा विशेषज्ञ व योगाचार्य कहते रहे हैं कि व्यक्ति के पेट से ही सेहत की राह गुजरती है। लेकिन चटपटे स्वाद की शौकीन युवा पीढ़ी इस बात को लगातार नजरअंदाज करती रही है। देश के प्रतिष्ठित चिकित्सा व शोध संस्थान पीजीआई के गेस्ट्रोलॉजी विभाग के प्रोफसर अब आंतों की बीमारी इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज यानी आईबीडी के बढ़ते मरीजों की संख्या को देखते हुए सलाह दे रहे हैं कि घर का खाना ही सेहत की कुंजी है। जो लोग परंपरागत भारतीय भोजन से नाता तोड़ रहे हैं वे बीमारियों से नाता जोड़ रहे हैं। दरअसल, हाल के दिनों में खासकर युवा पीढ़ी में पश्चिमी व चीनी खाद्य पदार्थों मसलन पिज्जा, बर्गर और नूडल्स आदि के प्रति दीवानगी बढ़ी है। वहीं आम लोगों में भी होटल-रेस्टोरेंट आदि से पका-पकाया खाना मंगाने का प्रचलन बढ़ा है। पीजीआई के विशेषज्ञ कह रहे हैं कि ज्यादा तला-भुना व बाहरी खाने से कई बीमारियां हो रही हैं, जिससे बड़ी आंत में घाव बन जाते हैं। फलत: अल्सर व कैंसर तक के खतरे बढ़ जाते हैं। चिकित्सक घर के परंपरागत खाने पर बल दे रहे हैं। वे भोजन के लिये कच्ची घानी, सोयाबीन, नारियल व तिल का तेल प्रयोग करने पर जोर दे रहे हैं। साथ ही बाजारों में एक बार प्रयोग किये गये खाद्य तेल को बार-बार उपयोग करने से बचने की सलाह दी गई है। विशेष रूप से सफर के दौरान बाहरी खाने के बजाय फल व आम भोजन के उपयोग की भी जरूरत बता रहे हैं। दरअसल, इसमें कोई बड़ी राकेट साइंस नहीं है और घर के बुजुर्ग इसी बात को अक्सर दोहराते भी रहे हैं, लेकिन नई पीढ़ी इस पर ध्यान नहीं देती है।

दरअसल, फास्ट फूड संस्कृति को जीवन का हिस्सा बनाने से देश-दुनिया में तमाम तरह की बीमारियों ने जन्म लिया है। मोटापा और उससे जुड़े तमाम रोग आज भारतीयों पर शिकंजा कस रहे हैं। हमारे जीवन में शारीरिक श्रम का महत्व कम होने और तला-भुना खाने से मोटापा, मधुमेह व उच्च रक्तचाप जैसी लाइफ स्टाइल बीमारियां शरीर में घर बनाने लगी हैं। इतना ही नहीं देर से सोना और देर से जागना हमारी आदत में शुमार हो गया है। बच्चे मैदान में खेलने के बजाय गैजेट्स में लगे रहते हैं, जिससे उन पर मोटापे का ज्यादा असर हो रहा है। वहीं समय पर न खाना और फास्ट फूड को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने से भी समस्या और जटिल हो गई है। सुबह नाश्ते को नजरअंदाज करना और देर रात भारी भोजन भी शारीरिक व्याधियों को निमंत्रण दे रहा है। योग व प्राकृतिक चिकित्सा इस बात पर बल देती है कि सुबह के समय हमारी पाचन शक्ति मजबूत होती है अत: हमारा नाश्ता समृद्ध होना चाहिए। फल व सलाद हमारे खाद्य श्रृखंला का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए। नई पीढ़ी में पिज्जा-बर्गर का तो जुनून है लेकिन फल-सब्जियों से परहेज करने लगे हैं। पश्चिमी देशों में हुए हालिया शोध बता रहे हैं कि जल्दी सोने और जल्दी जागने वाले लोग ज्यादा स्वस्थ रहते हैं। उनमें उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी लाइफ स्टाइल डिजीज कम होती हैं। विडंबना देखिये कि सदियों से जो हमारा खानपान व जीवन शैली रही है उसको ही नई पीढ़ी नजरअंदाज कर रही है। अब विदेशों से शोध के बाद आने वाले उसी ज्ञान पर हमारा ध्यान जा रहा है। दरअसल, जब तक हम युवा रहते हैं तब तक स्वस्थ शरीर के आवश्यक नियमों की अनदेखी करते हैं मगर जब उम्र ढलने लगती है तो शरीर बीमारियों का घर बन जाता है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की यह कमी रही है कि वह रोग के लक्षणों को तो ठीक करता है लेकिन उस रोग को जड़ से समाप्त करने के लिये जीवन शैली व खानपान में बदलाव पर बल नहीं देता। तब हम फौरी तौर पर तो ठीक हो जाते हैं लेकिन बीमारी के कारक शरीर में मौजूद रहते हैं।

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