विधानसभा के हालिया उपचुनावों के जो परिणाम सामने आए हैं, वे निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी के माथे पर शिकन लाने वाले कहे जा सकते हैं। बिहार जहां भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन सरकार है और पहली बार उसका मुख्यमंत्री बना है, वहां हाईप्रोफाइल बांकीपुर उपचुनाव में उसे हार का सामना करना पड़े तो इसको लेकर पार्टी की फिक्र बढ़ना लाजमी ही है। पिछले बिहार विधानसभा चुनावों में नई-नवेली बनी जन सुराज पार्टी यानी जे.एस.पी की करारी हार हुई थी। उस हार से सबक लेकर जेएसपी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ताल ठोककर बांकीपुर उपचुनाव मैदान में उतरे थे। इस तरह प्रशांत किशोर ने बांकीपुर उपचुनाव में अच्छी जीत हासिल करके भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल कर ही ली। राज्य में सत्ताधारी गठबंधन का नेतृत्व करने वाली भारतीय जनता पार्टी के लिये चुनाव परिणाम और भी अधिक कष्टदायक होगा, क्योंकि यह पार्टी के खाते वाली सीट थी। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन नवीन के राज्यसभा के लिये चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई थी। जाहिर तौर पर यह सामान्य विधानसभा सीट नहीं थी, इसको फिर से हासिल करना भाजपा की प्राथमिकता भी रही होगी। कमोबेश भाजपा के लिये ऐसी ही निराशाजनक खबरें अन्य राज्यों से भी आई हैं। लंबे समय से भाजपा का गढ़ माने जाने वाले एक और राज्य मध्यप्रदेश में भाजपा उम्मीदवार को हार मिली। मध्य प्रदेश की दतिया सीट कांग्रेस ने कब्जा ली है। दरअसल, इस सीट में उपचुनाव में टिकट बंटवारे को लेकर खासा बवाल हुआ था। पिछली भाजपा सरकार में इस सीट से एक दिग्गज मंत्री बने थे। इस बार उनको टिकट न मिलने पर उग्र प्रदर्शन व धरने हुए थे। इस बड़े विवाद का फायदा कांग्रेस के प्रत्याशी को हुआ। हां, भाजपा के लिए एक सुकूनभरी खबर गुजरात से आई। पार्टी के इस परंपरागत गढ़ में उपचुनाव के बाद, वडोदरा जिले की मंजलपुर विधानसभा सीट पर पार्टी ने अपना कब्जा बरकरार रखा।
बहरहाल, बिहार में बांकीपुर सीट को खो देना भाजपा को परेशान करने वाला जरूर है। बांकीपुर का बदला जनादेश न सिर्फ नितिन नवीन के लिये, बल्कि बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिये भी असहज करने वाली स्थिति है। दरअसल, प्रचार के दौरान प्रशांत किशोर ने स्थानीय मुद्दों के साथ मुख्यमंत्री पर तीखे हमले किये थे। उन्होंने राज्य में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था जैसे अहम मुद्दों को लगातार विभिन्न मंचों से उठाया था। जाहिर है अब मुख्यमंत्री को पार्टी के भीतर ही जवाबदेही को लेकर मुश्किल स्थिति का सामना करना होगा। वहीं इस जीत से प्रशांत किशोर के हौसले बुलंद हैं। वह देश के कई दिग्गज राजनेताओं के चुनाव अभियानों के सारथी रह चुके हैं। वे जनता के मिजाज को भांपने का हुनर भी जानते हैं। अब अपनी जीत से उत्साहित प्रशांत किशोर राज्य सरकार के खिलाफ अपना रुख और सख्त करेंगे। वे आने वाले समय में बिहार में जन सुराज पार्टी को तीसरे मोर्चे के तौर पर पेश करने की तैयारी में हैं। वहीं दूसरी ओर राज्य में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के बीच असहज होता गठबंधन, पहले ही प्रशांत किशोर के लिये अनुकूल स्थितियां बना रहा है। राजनीतिक पंडित इन उप-चुनावों के परिणामों की अलग-अलग तरह से व्याख्या कर रहे हैं। दरअसल, बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात की एक-एक विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव, नीट पेपर लीक और दूसरे मुद्दों को लेकर भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के खिलाफ जेन-जी के विरोध प्रदर्शनों के बाद पहली चुनावी लड़ाई थी। जंतर-मंतर पर हुए ऐतिहासिक आंदोलन के बाद सत्ताधारी पार्टी फिर से बढ़त बनाने की कवायद में जुटी है। वहीं दूसरी ओर राम मंदिर में दान की चोरी की घटना ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ाई हैं। जिसको लेकर विपक्ष लगातार हमलावर है। दरअसल, यह एक ऐसा भावनात्मक मुद्दा है जो उसके परंपरागत वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकता है। अब जब कि उत्तर प्रदेश में अहम विधानसभा चुनावों में करीब छह महीने ही बाकी हैं, पार्टी को अपनी खोई रफ्तार हासिल करने के लिये केंद्र और राज्य स्तर पर साफ-सुथरे शासन को प्राथमिकता देनी होगी।

