पिछले दिनों दिल्ली में अप्रत्याशित रूप से लोगों की गुमशुदगी की घटनाओं ने नीति-नियंताओं व अदालतों समेत पूरे देश का ध्यान खींचा। इस मामले में संज्ञान लेते हुए देश की शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार को इस बात की जांच करने के निर्देश दिए कि देश के विभिन्न इलाकों में बच्चों की लगातार लापता होने की घटनाओं में कहीं किसी देशव्यापी गिरोहों का हाथ तो नहीं है? संकट कितना बड़ा है यह इस बात से पता चलता है कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार साल 2023 में सारे देश से करीब आठ लाख लोग लापता हुए हैं, जिनमें अधिकांशत: बच्चे, महिलाएं और लड़कियां शामिल रही हैं। जाहिर तौर पर लापता लोगों का बढ़ता आंकड़ा कहीं न कहीं तंत्र की लापरवाही को ही उजागर करता है, जिसके चलते अपराधी-तत्व अपनी साजिशों को अंजाम देने में कामयाब हो जाते हैं। इसी साल जनवरी के पहले पखवाड़े में सिर्फ दिल्ली से आठ सौ लोगों के लापता होने की खबरों ने देशवासियों की चिंताओं को बढ़ाया है। देशवासियों में इस बात को लेकर भी चिंता और नाराजगी है कि इस गंभीर आपराधिक संकट के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के समन्वय से कोई व्यापक अभियान क्यों नहीं चलाया जाता। विडंबना यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर ऐसा कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है, जिससे यह पता चल सके कि राज्यवार कितने लोग वापस लौटे हैं और कितने लोग अभी भी गायब हैं। निश्चित रूप से इस संकट से निपटने के लिए एकीकृत राज्यवार ब्योरा उपलब्ध कराने की जरूरत है। बताया जाता है कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधि ने सुप्रीम कोर्ट में इस बात को स्वीकार किया है कि राज्यों से लापता बच्चों और उनसे जुड़े अभियोजन के अंतिम आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। दरअसल, यह पहली बार नहीं है कि शीर्ष अदालत ने लापता बच्चों के आंकड़े जुटाने को कहा हो। कोर्ट ने बीते साल दिसंबर में भी केंद्र सरकार से लापता बच्चों से जुड़े पिछले छह साल के देशव्यापी आंकड़े उपलब्ध कराने को कहा था।
दरअसल, कोर्ट ने इस बाबत राज्य के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करके प्रामाणिक जानकारी जुटाने को कहा था। इतना ही नहीं, गुमशुदा बच्चों की तलाश के मामले में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति के भी निर्देश दिए गए थे। इस दिशा में अपेक्षित प्रगति का न होना हमारे तंत्र की व्यवस्थागत कमियों को ही उजागर करता है। निर्विवाद रूप से सारे देश से यदि लाखों लोगों के लापता होने के आंकड़े सामने आ रहे हैं, तो बहुत संभव है कि इसके पीछे कोई संगठित गिरोह काम कर रहा होगा। साथ ही यह भी पता लगाने की जरूरत है कि लापता लोगों के मामले में अपराधियों की कारगुजारियों में कहीं एकरूपता तो नहीं है। विगत में मानव तस्करी के मामले गाहे-बगाहे उजागर होते रहे हैं, जिसमें लड़कियों को देह व्यापार के धंधे में धकेलने के भी आरोप लगते रहे हैं। लेकिन इस संकट का समाधान तभी संभव होगा जब देश के सभी राज्यों से प्रामाणिक आंकड़े जुटाए जाएंगे। उनके व्यापक अध्ययन से अपराध करने की वास्तविक तस्वीर सामने आ सकेगी। इसके साथ ही जरूरी है कि राज्य सरकारें भी अपने दायित्व को गंभीरता से निभाएं। इस मामले में किसी भी तरह की कोताही बर्दाश्त न की जाए। इसके अलावा निगरानी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। देश की कानून-व्यवस्था में भरोसा कायम करने के लिए इन घटनाओं को शासन-प्रशासन के स्तर पर गंभीरता से लिया जाना भी जरूरी है। यहां इस बात की भी पड़ताल होनी चाहिए कि केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्रालय की तरफ से राज्यों में बच्चों की गुमशुदगी के आंकड़े दर्ज करने के लिए जो पोर्टल बनाया गया है, उसमें नियमित रूप से आंकड़े क्यों नहीं दर्ज किए जाते हैं। यह विडंबना है कि सरकारों को जिस दायित्व को अपने स्तर पर ईमानदारी से निभाने की जरूरत होती है, उसके लिये देश की शीर्ष अदालत को बार-बार याद दिलाना पड़ता है। नागरिकों को जागरूक करने के लिए भी सुरक्षा गाइड लाइन्स जारी करने की जरूरत है, जिससे लोग बच्चों की सुरक्षा के लिए सजग व सतर्क रह सकें।

