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स्कूल के शूल

सुकोमल मन को चाहिए संवेदनशील संबल

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पिछले दिनों आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम का वह वीडियो पूरे देश में वायरल हुआ, जिसमें एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका बच्चे को डांटती और थप्पड़ मारती नज़र आ रही थी। उसके बाद बच्चे को कटे पेड़ की तरह गिरते देखा गया। बताते हैं कि होमवर्क पूरा न करने पर टीचर ने एलकेजी के छह वर्षीय छात्र प्रणय तेजा को पहले बुरी तरह डांटा और फिर उसे जोर से थप्पड़ मारा, जो उसे एक शॉक की तरह लगा। सीसीटीवी कैमरे की पुलिस द्वारा हासिल रिकॉर्डिंग में बच्चे की पिटाई और जमीन पर गिरने का दृश्य स्पष्ट दिखाई दे रहा था। बच्चे को अस्पताल ले जाया गया। जहां बताया गया है कि उसकी मृत्यु हो चुकी है। इस घटना के बाद व्यापक विरोध प्रदर्शन भी हुए। अभिभावकों का आरोप है कि बच्चा घर से स्वस्थ स्थिति में स्कूल के लिए निकला था। उसे कोई रोग भी नहीं था। बाकायदा उसने स्कूल जाने की खुद जिद की। उसके पिता के अनुसार उनका परिवार एक तीर्थयात्रा पर गया था, जिसकी वजह से वह होमवर्क नहीं कर सका। इसके बाद टीचर के खिलाफ कार्रवाई और निजी स्कूलों में छात्रों की सुरक्षा बढ़ाने और संवेदनशील व्यवहार की मांग तेज हुई। वहीं दूसरी ओर स्कूल प्रशासन ने दलील दी कि खेल के मैदान में गिरने की वजह से बच्चे की जान गई। बताया जाता है कि स्कूल में कोई खेल का मैदान था ही नहीं। पूरी दुनिया में ऐसे तमाम अध्ययन व शोध निष्कर्ष सामने आ चुके हैं कि स्कूली बच्चों का किसी भी तरह शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न नहीं किया जाना चाहिए। यह न केवल शिक्षकों का शैक्षिक दायित्व है बल्कि वे इसके लिये कानूनी रूप से भी बाध्य हैं। लेकिन विडंबना यह है कि शिक्षकों ने जाने क्यों मान लिया है कि किसी छात्र की गलती को दंडित या प्रताड़ित करके ही सुधारा जा सकता है। कहीं न कहीं यह शिक्षकों में धैर्य व तार्किक सोच की कमी को भी दर्शाता है।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी पिछले दिनों ऐसी ही घटना सामने आई। वहां विनोद नगर में एक सरकारी स्कूल की ग्यारह साल की छात्रा की सजा दिए जाने के बाद मौत हो गई। उसका कसूर सिर्फ इतना था कि वह क्लास में किताब लाना भूल गई। शिक्षिका ने उसे क्लास के पीछे हाथ ऊपर करके खड़े होने की सजा दी। कक्षा में इस तरह काफी देर तक खड़े रहने और अपमान से आहत होने के बाद उसकी तबीयत खराब हो गई। उसे इलाज के लिये अस्पताल ले जाया गया लेकिन बाद में उसकी मौत हो गई। इसी तरह की अन्य घटना में फरीदाबाद के एक स्कूल में मामूली बात पर छात्रा को चार घंटे खड़े होने की सजा दी गई। घटना से आहत व अपमानित महसूस करके छात्रा ने स्कूल की छत से कूदकर जान दे दी। आखिर कई स्तर पर प्रशिक्षित शिक्षक इस बात को समझने का प्रयास क्यों नहीं करते कि उन्हें छात्रों के साथ संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए। वे क्यों नहीं सोचते कि क्लास में सबके सामने दंडित किए जाने से बच्चे के कोमल मन-मस्तिष्क पर कैसा नकारात्मक असर पड़ेगा। शीर्ष अदालत ने सभी स्कूलों के शिक्षकों के लिए इस बाबत सभी दिशा-निर्देश स्पष्ट रूप से दे रखे हैं, लेकिन इसके बावजूद अप्रिय हो रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कई शिक्षक इन कानूनी व नैतिक मापदंडों को ताक पर रखकर बच्चों को प्रताड़ित करते हैं। निस्संदेह, कोई भी शैक्षिक व्यवस्था किसी भी शिक्षक को निरंकुश व्यवहार करने और अपनी भड़ास निकालने की इजाजत नहीं देती। दरअसल, समय के साथ-साथ बच्चों में ऐसे भाव विकसित हो गए हैं कि वे कक्षा में सार्वजनिक रूप से अपमान व प्रताड़ना बर्दाश्त नहीं करते। समाज में एकल परिवार परंपरा के प्रचलन के बाद बच्चे अभिभावकों के ध्यान के केंद्र में आ गए हैं। संयुक्त परिवारों में बच्चे मान-अपमान के प्रति इतने ज्यादा संवेदनशील नहीं होते थे। लेकिन आज घर में अकेले होने के नाते मिलने वाले विशिष्ट व्यवहार की अपेक्षा बच्चा स्कूल में भी करता है। फलतः किसी दंड या ताड़ना को वह बेहद गंभीरता से लेता है। शिक्षक बिरादरी को उनके व्यवहार को संवेदनशील ढंग से देखना होगा।

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