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मां-बाप की कद्र कानूनी बाध्यता

देश के लिए अनुुकरणीय तेलंगाना की पहल

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वैसे तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिये शर्मनाक है कि जन्म देकर पालन-पोषण करने वाले मां-बाप की जीवन की सांझ में बेकद्री की जाए। फिर गुजारे भत्ते के लिये कानून-प्रशासन से मांग करनी पड़े। लेकिन यह मौजूदा समय की हकीकत है कि ऐसे किस्से गाहे-बगाहे सुनने को मिलते हैं। सही मायनों में बुढ़ापा अपने आप में बड़ी चुनौती है, जब शरीर की क्षमताओं का ह्रास होने लगता है और आय के स्रोत लगभग खत्म होने लगते हैं। सेवानिवृत्ति की जमा-पूंजी बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह और मकान बनाने में खर्च हो जाती है। उन लोगों की स्थिति तो और दुखद हो जाती है जो निजी क्षेत्र या किसी प्राइवेट काम-धंधे में लगे रहते हैं। उन्हें तो पेंशन भी नहीं मिलती। वहीं धीरे-धीरे अक्षम होता शरीर उम्रदराज होने पर लगने वाली बीमारियों का घर बन जाता है। ऐसे स्थिति में अपने जब मां-बाप की देखभाल न करें तो यह एक सामाजिक अपराध ही कहा जाएगा। जाहिर है, जब खून के रिश्ते साथ न दें तो कानून ही अंतिम सहारा रह जाता है। इस दिशा में तेलंगाना विधानसभा में पारित तेलंगाना कर्मचारी जवाबदेही और माता-पिता सहायता निगरानी विधेयक 2026 पूरे देश के बुजुर्गों के लिये एक नई उम्मीद जगाता है। इस राज्य की विधानसभा ने बीते रविवार वरिष्ठ नागरिकों की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से यह विधेयक पारित किया। निस्संदेह, देश में पहले से एक राष्ट्रीय कानून ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007’ मौजूद है, लेकिन नये विधेयक का दायरा विस्तृत है। जो पहले कानून की कुछ विसंगतियों को दूर करता है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राज्य के नये विधेयक के दायरे में जनप्रतिनिधियों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है। यह विधेयक जन प्रतिनिधियों, सरकारी व निजी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य रूप से बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करना सुनिश्चित करता है।

तेलंगाना विधानसभा में पारित यह विधेयक यकीनी बनाता है कि यदि बच्चे मां-बाप की देखभाल नहीं करते तो उनके वेतन से पंद्रह फीसदी या दस हजार रुपये, जो भी कम है, शिकायत मिलने पर माता-पिता को देय राशि के रूप में काटे जाएंगे। उल्लेखनीय है कि अपनी चल-अचल संपत्ति बेटे के नाम करने वाले मशहूर कारोबारी विजयपत सिंघानिया की बेदखली का एक मामला चर्चा में आया था। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा और देश में प्रभावी कानून बनाए जाने की चर्चा तेज हुई थी। यह सुखद ही है कि तेलंगाना सरकार ने सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए यह पहल की। सरकार का कथन है कि समाज में नैतिक दायित्वों को बढ़ावा देना इस विधेयक का मकसद है। यदि बच्चे अपना दायित्व नहीं निभाते तो कानून के जरिये उन्हें इसके लिये बाध्य किया जा सकेगा। इस विधेयक में प्रावधान है कि बच्चों द्वारा मां-बाप का भरण-पोषण न करने पर वे जिला कलेक्टर के सामने आवेदन कर सकेंगे। उल्लेखनीय है कि यह कानून न केवल सरकारी कर्मचारियों पर बल्कि निजी क्षेत्र के कर्मियों, सांसदों, विधायकों, मनोनीत सदस्यों तथा स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर भी लागू होगा। निश्चित रूप से भारतीय परिवार परंपरा में सदियों से गरिमापूर्ण स्थान रखने वाले माता-पिता के सम्मान व जीवन-यापन सुनिश्चित करने की दिशा में यह विधेयक एक मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस विधेयक में जहां कलेक्टर को नामित प्राधिकारी बनाया गया है, वहीं माता-पिता को भी संपत्ति के बंटवारे की स्थिति व आय की स्पष्ट जानकारी देनी होगी। ऐसे मामलों में माता-पिता तथा कर्मचारी को सुनवाई का मौका मिलेगा। कलेक्टर को साठ दिनों के भीतर शिकायत का निस्तारण करना होगा। फैसले के बाद कर्मचारी के वेतन से काटी गई राशि सीधे मां-बाप के खाते में जाएगी। उल्लेखनीय है कि केवल जैविक माता-पिता ही नहीं, सौतेले माता-पिता भी शिकायत करने के हकदार होंगे। इस विधेयक में इस बात का प्रावधान भी है कि इस बाबत शिकायतों की सुनवाई के लिये वरिष्ठ नागरिक आयोग का गठन किया जाएगा। उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आयोग के मुख्य आयुक्त के रूप में काम करेंगे। अर्ध न्यायिक शक्तियों वाले आयोग में प्रशासन व सामाजिक क्षेत्र के अनुभव वाले दो सदस्य भी होंगे। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह विधेयक वरिष्ठ नागरिकों के जीवन-यापन व सम्मान बहाली में सहायक होगा।

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