हाल के वर्षों में कम समय के सर्दी के मौसम के बाद तापमान में अचानक वृद्धि, मौसम के पैटर्न में आ रहे असामान्य बदलाव का स्पष्ट संकेत है। सर्दी के बाद वसंत के मौसम का जल्दी चले जाना और जल्दी गर्मी का आना क्षेत्रीय वायुमंडल परिवर्तनों और दीर्घकालिक जलवायु परिवर्तन का कारण माना जा रहा है। जाहिर है मौसम के मिजाज में आ रहे इस असामान्य बदलाव का हमारे जीवन और आजीविका पर गहरा प्रभाव आने वाले दिनों में नजर आएगा, जिसको लेकर देशव्यापी चर्चा जारी है। खासकर उत्तर भारत के कृषि क्षेत्र में इसके नकारात्मक आर्थिक परिणामों को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। चिंता की बात यह भी है कि हिमाचल प्रदेश के सेब के बागों में, कम होती ठंडक से उत्पादकता में गिरावट देखी जा रही है। दरअसल, मौसमी बदलाव फलों के नाजुक जैविक चक्र को बाधित कर रहा है, जिसके चलते उपज में भारी नुकसान के साथ-साथ गुणवत्ता में गिरावट की आशंका व्यक्त की जा रही है। इससे बचने के लिए अनुकूलन उपायों में जलवायु अनुरूप बागवानी पद्धतियों को अपनाने और दीर्घकाल में सेब पट्टी को ऊंचे क्षेत्रों में स्थानांतरित करने की जरूरत होगी। आवश्यकता होगी कि हम सूखा-सहिष्णु फसलों को अपनाएं। कम जल के बेहतर उपयोग के प्रयास हों। अब सिर्फ वैकल्पिक फसलों के भरोसे ही नहीं रहा जा सकता, कई मोर्चों पर पहल करने की जरूरत होगी। कुल मिलाकर एक स्पष्ट रणनीति को अपनाकर हम बढ़ती गर्मी के दुष्प्रभावों से बच सकते हैं।
निस्संदेह, इसमें दो राय नहीं है कि मार्च के पहले सप्ताह में उच्च तापमान का महसूस होना, आने वाले संकट का स्पष्ट संकेत है। अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में ग्रीष्म ऋतु में आने वाले लू के दिनों की संख्या 1980 के बाद से दुगनी से भी अधिक हो गई है। हमारे देश में तीव्र शहरीकरण, सघन निर्माण और हरित क्षेत्रों के लगातार जारी क्षरण के चलते भी तापमान में वृद्धि हुई है। ऐसे में बढ़ते तापमान से उत्पन्न जल व ऊर्जा संकट से निपटने के लिए तत्काल कारगर योजनाओं की जरूरत है। इसके साथ ही शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु में तेजी से होने वाले परिवर्तन के इस नये असामान्य परिदृश्य के लिए नागरिकों की जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के लिए भी एक नया चार्टर बनाने की आवश्यकता होगी। सरकारों की तैयारियों को लेकर भी स्पष्ट रीति-नीति का निर्धारण जरूरी है। निस्संदेह, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के निस्तारण के लिए रणनीतियों को लेकर सहभागी दृष्टिकोण प्रभावकारी हो सकता है। आने वाले समय में मौसम की चरम स्थितियां घातक साबित हो सकती हैं, जिनका मुकाबला मौजूदा अपर्याप्त प्रशासनिक योजनाओं के जरिये संभव न होगा। इसके लिए कारगर रणनीतियां बनाने की जरूरत होगी। हमें बिजली की अनुमानित मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को कम करना होगा। समय-समय पर स्वास्थ्य संबंधी परामर्श जारी करने तथा प्रभावी उपचार की उपलब्धता भी जरूरी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हमें बिजली और पानी की बर्बादी पर रोक लगाने के लिए तत्काल कदम उठाने होंगे।

