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मां-बाप का हक

देखभाल करना नैतिक-कानूनी जिम्मेदारी

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संवेदनाओं के क्षरण व आत्मकेंद्रित होती नई पीढ़ी के दौर में मां-बाप की बेकद्री विचलित करने वाली है। यह विडंबना ही है कि उन मां-बाप की देखभाल करने का निर्देश अदालत को देना पड़ रहा है, जिनका ऋण वे कभी चुका ही नहीं सकते। मां के रक्त से सींचे गए और पिता की पसीने से पले-बढ़े बेटे से यदि अदालत को कहना पड़े कि ‘मां को घर में रहने के लिये एक कमरा, अलग बाथरूम और बुनियादी सुविधाएं दी जाएं’, तो यह बात शर्मसार करने वाला है। जिस मां ने नौ माह तक बेटे को अपने पेट में पाला, उसे घर में रहने देने के लिये अदालत को निर्देश देना पड़े, इससे बड़ा कृतघ्नता का दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। भले ही यह कोर्ट का आदेश हो, लेकिन यह एक अलिखित नैतिक दायित्व पहले से ही है। निश्चय ही यह घटनाक्रम हमारे समाज की बेहद कष्टदायक होती तसवीर को ही उकेरता है। सामान्य तौर पर मां-बाप अपना पेट काटकर, अपने सुख-सुविधाओं पर समझौता कर, बच्चों को बेहतर से बेहतर देने का प्रयास करते हैं। एक मां-बाप ही होते हैं जो सच्चे मन से अपने बच्चों की तरक्की चाहते हैं। निस्संदेह, ऐसी पढ़ी-लिखी संतानों से अनपढ़ संतानें बेहतर हैं, जो कम से कम अपने वृद्ध माता-पिता के पास रहकर उनका ख्याल तो रखती हैं। यह सवाल परेशान करने वाला है कि जिस समाज में ‘मातृ देवो भव’ की सर्वस्वीकार्य मान्यता रही हो, वहां ये कैसी कलयुगी संतानें जन्म ले रही हैं? मां-बाप की बेकद्री की यह अकेली कहानी नहीं है, हर रोज अखबारों में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जिसमें धन-संपत्ति के लिये मां-बाप से क्रूरता की जा रही होती है। निस्संदेह, यदि उनकी अवहेलना व उत्पीड़न का यह क्रम यूं ही चलता रहा तो बहुत संभव है भारत में भी पश्चिमी देशों जैस चलन शुरू हो जाएगा, जहां मां-बाप बच्चों को होश संभालने के बाद ही उन्हें पैरों पर खड़ा होने के लिये चलता कर देते हैं।

दरअसल, पश्चिमी देशों में मां-बाप मानकर चलते हैं कि बड़े होकर बच्चों ने उनकी देखभाल नहीं करनी, अत: इनसे पहले ही किनारा कर लो। आधुनिकता व तरक्की की लाख इबारतें लिख ली जाएं, भारतीय समाज कभी पश्चिमी समाज की तर्ज पर नहीं चल सकता। भारत श्रवण कुमार का देश है और आज भी अधिसंख्य संतानें अपने मातृ-पितृ ऋण उतारती हैं। उनका ख्याल रखती हैं। विकृतियां महानगरीय संस्कृति की भी देन हैं। बच्चों की भी अपनी दुश्वारियां हैं। फिर भी भारतीय संस्कृति में वो शक्ति है जो पारिवारिक मूल्यों को सींचती है। बहरहाल, माता-पिता की सेवा-सम्मान व बुढ़ापे में उनकी देखभाल करना महज एक सांस्कृतिक दिखावा नहीं है बल्कि संतानों का नैतिक-कानूनी दायित्व भी है। हाल ही में कोर्ट ने जिस घर में बेटे को वृद्ध मां को एक कमरा आदि देने को कहा, वह मकान वृद्धा के दिवंगत पति द्वारा ही बनाया गया था। जिसमें अपना हक पाने हेतु उसे न्यायिक हस्तक्षेप का सहारा लेना पड़ा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि किसी वृद्ध मां को आश्रय और आत्म स्वाभिमान हेतु बच्चों के खिलाफ कोर्ट-कचहरी करनी पड़े। निस्संदेह, यह उस भारतीय संयुक्त परिवार परंपरा का पराभव ही है जिसकी मिसाल पश्चिमी भोगवादी संस्कृति के अगुवा दिया करते थे। यहां न्यायालय के संवेदनशील व न्यायपूर्ण निर्णय की मुक्त कंठ से सराहना करनी होगी, जिसमें कोर्ट ने निर्णय के खिलाफ दी गई पुत्र की याचिका को खारिज कर जुर्माना लगाया। यह कष्टकारी ही है कि देशभर की अदालतें परित्यक्त-प्रताड़ित माता-पिता से जुड़े विवादों का सामना कर रही हैं। न्यायाधिकरणों और उच्च न्यायालयों ने दुर्व्यवहार करने वाले बच्चों को बेदखल करने तक के आदेश दिए हैं। अदालतों द्वारा माता-पिता द्वारा अर्जित संपत्ति पर उनके अधिकारों को बरकरार रखने ने वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007 को सुदृढ़ ही किया है। न्यायपालिका ने संपत्ति के अधिकार के साथ ही कल्याण संबंधी चिंताओं को भी सावधानीपूर्वक संतुलित किया है। न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया है कि पारिवारिक झगड़ों में कानून का दुरुपयोग न हो। लेकिन फिर भी संकट का समाधान सिर्फ कानून से संभव नहीं है। हाईकोर्ट का फैसला संदेश देता है कि विरासत पर बातचीत हो सकती है, लेकिन मानवता पर नहीं।

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