सत्ताधीशों की इच्छा शक्ति की कमी और प्रवर्तन एजेंसियों की लापरवाही से खनन माफिया के हौसल बुलंद हैं। कहीं न कहीं नागरिकों की उदासीनता भी इसके मूल में हैं। पंजाब के रोपड़ जिले की शिवालिक पहाड़ियों में हो रही तबाही उस भयावह स्थिति को दर्शाती है, जिसका खमियाजा आने वाली पीढ़ियों को भी भुगतना पड़ेगा। वजह साफ है कि अंधाधुंध खनन से शिवालिक पहाड़ियों के पारिस्थितिकीय तंत्र को भारी क्षति पहुंच रही है। जो हमें यह भी बताता है कि नीति और प्रवर्तन के बीच खाई में पर्यावरणीय अपराध कैसे और किस तेजी से पनपते हैं। प्रशासन की नाक के नीचे खुदाई करने वाली भारी मशीनों का खुलेआम प्रयोग अवैध खनन हेतु किया जा रहा है। इस पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र की पूरी पहाड़ियों को समतल किया जा रहा है। जो हमारे पर्यावरण के लिये एक गंभीर चुनौती है। यह क्षति शिवालिक पहाड़ियों के मूल पारिस्थितिक कार्यों मसलन भूजल पुनर्भरण, मृदा-स्थिरता और जैव-विविधता संरक्षण जैसे जीवन रक्षक लक्ष्यों को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। दरअसल, यह शिवालिक पर्वतमाला भू-संरचना की दृष्टि से नयी बनी हुई है और स्वाभाविक रूप से अस्थिर है। निर्विवाद रूप से किसी भी स्थान पर होने वाली अनियंत्रित खुदाई से भूमि का कटाव बहुत तेजी से होता है। जिसके चलते वर्षा ऋतु और उसके बाद भूस्खलन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती है। वहीं इन क्षेत्रों में गाद जमाव का संकट भी गहरा जाता है। कालांतर इसके चलते जल निकासी के पैटर्न में अप्रत्याशित बदलाव देखने में आता है। यह सर्वविदित है कि एक बार इन पहाड़ियों को अवैध रूप से काटकर समतल कर दिया जाता है तो उसके मूल स्वरूप को फिर प्राप्त कर पाना लगभग असंभव है। दूसरे शब्दों में कहें उस क्षेत्र विशेष का प्राकृतिक संरक्षण कवच हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है। ऐसे में प्राकृतिक सुरक्षा को नष्ट करने वाला विकास कालांतर आपदा का कारक बन सकता है।
दरअसल, यह ऐसा प्राकृतिक सुरक्षा तंत्र होता है जो निचले मैदानी इलाकों को बाढ़ और जल संकट से बचाता है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि इस बाबत जवाबदेह अधिकारियों द्वारा दलील दी जाती रही है कि इस क्षेत्र में खनन की प्रक्रिया पर्यावरण संबंधी स्वीकृतियों के आधार पर की जाती रही है। साथ ही यह भी सफाई दी जाती है कि ऐसी स्वीकृतियों का उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना लगाया जाता है। लेकिन हकीकत तब उजागर हो जाती है जब स्थानीय लोग रात के समय होने वाले खनन कार्यों, निर्धारित सीमा से अधिक और बड़े पैमाने पर पहाड़ी इलाकों में कटाई होने के आरोप लगाते हैं। ऐसे में अधिकारियों की तमाम दलीलें खोखली ही साबित होती हैं। दरअसल,सवाल नियम-कानूनों की प्रभावकारिता का नहीं है बल्कि असली दिक्कत प्रवर्तन एजेंसियों की उदासीनता की है। जो वस्तु-स्थिति से अवगत होने के बावजूद इन आपराधिक कृत्यों के प्रति आंखें मूंदे रहती हैं। दरअसल, खनन कार्यों से जुड़े ठेकेदारों को आपराधिक तत्वों व राजनेताओं का संरक्षण भी एक बड़ी चुनौती है। इसमें दो राय नहीं है कि जब अवैध खनन के खिलाफ जमीनी स्तर पर निगरानी के बजाय महज कागजी कार्रवाई का सहारा लिया जाता है तो अवैध खनन को संबल मिलता है। ऐसा भी नहीं है कि यह अवैध खनन केवल पंजाब की शिवालिक पहाड़ियों के आसपास ही हो रहा है। पूरे भारत में, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तमाम क्षेत्रों में अवैध खनन लगातार पर्यावरण से जुड़े कानूनों की सीमाओं का उल्लंघन करता नजर आता है। अकसर खनन के लिये दिए गए परमिटों में अस्पष्टता और स्थानीय स्तर पर कमजोर निगरानी का फायदा उठाया जाता है। वह भी तब जब सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण के फैसलों में बार-बार इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि आर्थिक गतिविधियां पारिस्थितिकीय नुकसान की कीमत पर नहीं चलायी जा सकती। फिर भी, जमीनी स्तर पर, प्रवर्तन एजेंसियां या तो शक्तिहीन दिखाई देती हैं या निर्णायक कार्रवाई करने की इच्छाशक्ति उनमें नजर नहीं आती। वास्तव में अवैध खनन पर सिर्फ जुर्माना लगाने के बजाय प्रतिबंधित क्षेत्रों का सख्त सीमांकन, प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी तथा अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत है।

