राम भरोसे स्कूल

भविष्य से खिलवाड़ की जवाबदेही तय हो

राम भरोसे स्कूल

यह बात विचलित करती है कि विकास की ऊंचाइयां पाने का दावा करने वाले राज्य हरियाणा के कई सरकारी स्कूलों में एक शिक्षक सैकड़ों छात्र-छात्राओं को पढ़ा रहा है। कहीं ये शिक्षक पूर्णकालिक हैं तो कहीं गेस्ट टीचर। गेस्ट टीचर मतलब एक तदर्थ व्यवस्था, जिसमें शिक्षक को उसके वाजिब हक भी योग्यता के बावजूद नहीं मिल पाते। विडंबना है कि जिन बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है, उन्हें पढ़ने-लिखने और विकसित होने का नैसर्गिक अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है। आखिर कहां हैं जनप्रतिनिधि और कहां है शिक्षा विभाग? सोनीपत में सत्तापक्ष के एक सांसद के गांव में एक सरकारी स्कूल केवल एक गेस्ट टीचर के भरोसे चलाया जा रहा है तो कहने-सुनने को कुछ शेष नहीं रह जाता। आखिर जब सांसद महोदय अपने गांव की सुध नहीं ले पा रहे हैं तो उनके संसदीय क्षेत्र के शेष स्कूल किससे उम्मीद रखें? ये हालात समाज की आर्थिक विसंगति और तंत्र की संवेदनहीनता को ही दर्शाते हैं। इन स्कूलों में कमजोर वर्गों व आर्थिक दृष्टि से मजबूर परिवारों के बच्चे भविष्य संवारने के लिये आते हैं। लेकिन यहां भी व्यवस्था की विद्रूपता उनकी मजबूरी का मजाक उड़ाती नजर आती है। जाहिर ये हालात व्यवस्था में खोट और सत्ताधीशों की संवेदनहीनता को ही दर्शाते हैं। कहीं न कहीं नागरिकों के स्तर पर भी यह कमी है कि वे शिक्षा अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों पर स्कूलों की दशा-दिशा सुधारने के लिये दबाव नहीं बना पाते। सवाल यह भी है कि राज्य सचिवालय से लेकर जिला स्तर पर शिक्षा अधिकारियों की एक बड़ी फौज क्या कर रही है? क्यों लगातार ऐसे स्कूलों की पहचान नहीं होती जहां शिक्षकों की नियुक्ति नहीं है? हमारे यहां प्रशिक्षित शिक्षकों की कोई कमी नहीं है। वे काम करने को भी उत्साहित हैं लेकिन व्यवस्था का जंजाल उन्हें पढ़ाने के उनके हक से वंचित कर रहा है, जिससे मजबूर होकर वे अन्य व्यवसायों में रोजी-रोटी की तलाश में चले जाते हैं।

सही मायनों में सरकारी स्कूलों को शासन-प्रशासन ने भगवान भरोसे छोड़ दिया है। बयानवीर सांसद, मंत्री, विधायक से लेकर शिक्षा अधिकारी तक इस हकीकत से अनजान बने रहते हैं कि तमाम स्कूलों में शिक्षकों की नियुक्तियां नहीं हुई हैं। दरअसल, इन स्कूलों में कमजोर व साधनविहीन परिवारों के बच्चे पढ़ते हैं जो अपनी आवाज को बुलंद नहीं कर पाते। कहीं न कहीं समाज में आर्थिक आधार पर विभाजन भी इन स्कूलों की दुर्दशा की वजह रहा है। संपन्न तबके और सरकारी अधिकारियों के बच्चे महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। समाज का वह संपन्न व जागरूक वर्ग जो शासन-प्रशासन पर दबाव बनाने में सक्षम है, उसकी रुचि इन स्कूलों को लेकर नहीं होती, क्योंकि उनके बच्चे महंगे व निजी स्कूलों में पढ़ रहे होते हैं। अक्सर यह बात उठायी जाती है कि यदि सरकारी अधिकारियों व मंत्रियों के बच्चों के लिये सरकारी स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य कर दिया जाये तो सरकारी स्कूलों के अच्छे दिन आ जाएंगे। दलील दी जा रही है कि हरियाणा में शिक्षकों के स्थानांतरण की प्रक्रिया ऑनलाइन होने के बाद स्थानीय शिक्षा अधिकारी शिक्षकों की वैकल्पिक नियुक्ति नहीं कर पा रहे हैं। इस विसंगति की ओर राज्य सरकार को भी ध्यान देना होगा कि कोई नई व्यवस्था लागू करने से पहले सभी पहलुओं पर विचार किया जाये। कहने की आवश्यकता नहीं है कि जब एक शिक्षक सौ-सौ विद्यार्थियों को पढ़ाएगा तो शिक्षा का स्तर कैसा होगा। इतने बच्चों को अनुशासन के साथ बैठा पाना ही अपने आप में बड़ी चुनौती है। ऐसे में उनकी पढ़ाई जरूरी मानकों के अनुरूप हो पायेगी, असंभव ही है। एक शिक्षक सभी विषयों में दक्ष नहीं हो सकता। उसकी ऊर्जा तमाम सरकारी कागजों का पेट भरने और प्रबंधकीय कार्यों में क्षय होती है। ऐसे में अनुमान लगाया जा सकता है कि कोरोना संकट में जब निजी स्कूल ऑनलाइन शिक्षा दे रहे थे तो इन सरकारी स्कूलों के बच्चों के हिस्से क्या ज्ञान आया होगा। जिनके पास मोबाइल-इंटरनेट नहीं हैं, उन्हें ऑनलाइन शिक्षा देने की बात बेमानी ही है। आधी-अधूरी पढ़ाई के चलते ये स्कूल बीमार भविष्य के कारखाने ही साबित हो रहे हैं।

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