छापेमारी का लोकतंत्र

विरोध के स्वरों पर सरकारी एजेंसियां भारी

छापेमारी का लोकतंत्र

लोकतंत्र का मूल चरित्र होता है पक्ष और विपक्ष के सहयोग-सामंजस्य से शासन चलाना। भारी बहुमत से हासिल सत्ता के ये मायने कदापि नहीं हैं कि विपक्षी दलों की आवाज को कमजोर किया जाये। उन्हें वित्तीय अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के लिये बनी केंद्रीय एजेंसियों के जरिये दबाया जाये। हालांकि, यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है और विगत में कई केंद्र में आसीन सरकारों पर भी इन सरकारी एजेंसियाें के दुरुपयोग के आरोप विपक्ष द्वारा गाहे-बगाहे लगाये जाते रहे हैं। बात केवल इतनी ही कि ऐसे कानूनों व एजेंसियों के दुरुपयोग के मामलों की संख्या में कुछ अंतर रहता है। हाल के दिनों में प्रवर्तन निदेशालय की अति सक्रियता को लेकर विपक्ष मुखर रहा है। उसका आरोप है कि गैर-भाजपा वाली राज्य सरकारों व उनके नेताओं को ही निशाना बनाया जाता है। जबकि भाजपा शासित राज्यों में किसी नेता पर कार्रवाई होती नजर नहीं आती। यही वजह कि हाल ही में ईडी के अधिकारों को लेकर आए शीर्ष अदालत के फैसले पर विपक्षी दलों ने निराशा जतायी है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस समेत 17 विपक्षी दलों ने साझा बयान जारी करके प्रवर्तन निदेशालय को मिले अधिकारों पर सवाल उठाकर धनशोधन निवारण कानून यानी पीएमएलए की समीक्षा की भी मांग की है। विपक्ष का मानना है कि ईडी को मिले अधिकारों पर शीर्ष अदालत के फैसले से केंद्र सरकार की मनमानी बढ़ेगी। कालांतर सरकारें मनमाने व्यवहार करेंगी और भारतीय लोकतंत्र में उसके दूरगामी परिणाम होंगे। विपक्ष का कहना है कि कोर्ट के फैसले में धनशोधन निवारण कानून में किये गये संशोधनों को यथावत रखा गया है। इन संशोधनों की व्यापक पड़ताल की जरूरत थी। दरअसल, विपक्षी दलों को आशंका है कि ईडी के अधिकारों को मान्यता से केंद्र सरकार की राजनीतिक प्रतिशोध की प्रवृत्ति बढ़ेगी। विपक्ष ने विश्वास जताया है कि इसके बावजूद कालांतर संवैधानिक प्रावधानों की ही जीत होगी। उल्लेखनीय है कि इस साझा बयान पर कांग्रेस, आप, तृणमूल कांग्रेस, डीएमके, सीपीएम, सीपीआई, आरजेडी, शिवसेना आदि सत्रह दलों की सहमति है।

दरअसल, बड़े बहुमत से सत्ता में लगातार दूसरी बार आई भाजपा की केंद्र सरकार पर विपक्ष बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप लगाता रहा है। महाराष्ट्र में पूर्व सरकार के मंत्रियों व नेताओं के अलावा पश्चिम बंगाल आदि में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी को विपक्ष राजनीतिक दुराग्रह की कार्रवाई के रूप में देखता है। नेशनल हेराल्ड मामले में कार्रवाई को इसी कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। सर्वप्रथम कांग्रेस के दो शीर्ष नेताओं से पूछताछ और फिर नेशनल हेराल्ड के प्रतिष्ठानों पर छापेमारी को राजनीतिक दुराग्रह के रूप में देखा जा रहा है। फिर यंग इंडियन के दफ्तर को सील करने पर भी विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी समाचार पत्र के कार्यालय में इस तरह की कार्रवाई कई सवालों को जन्म देती है। ऐसी कार्रवाई करते समय केंद्रीय एजेंसियों को अपनी विश्वसनीयता का ख्याल भी रखना चाहिए। जैसे कि शीर्ष अदालत कई बार सीबीआई को पिंजरे के तोते की संज्ञा देकर उसकी विश्वसनीयता का प्रश्न उठाती रही है। सरकारें तो आती-जाती रहती हैं लेकिन लोकतंत्र की विश्वसनीयता व कानून की व्यवस्था के अनुपालन के लिये इन एजेंसियों को नीर-क्षीर विवेक से काम लेना चाहिए। इस कार्रवाई की विश्वसनीयता व तार्किकता से देश की जनता को भी सहमत होना चाहिए। निस्संदेह, देश में भ्रष्टाचार खत्म होना चाहिए, लेकिन कोई कार्रवाई राजनीतिक दुराग्रह से प्रेरित नहीं होनी चाहिए। अन्यथा जनादेश से होने वाले बदलाव के बाद फिर इसी तरह दुराग्रह से कार्रवाई का सिलसिला चलता रहेगा। यह विडंबना ही है कि विपक्ष में रहते हुए जो राजनीतिक दल जिन एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं, वे सत्ता में आने के बाद उसी तरह के कृत्यों को अंजाम देने लगते हैं। जिससे आम आदमी को समझ नहीं आता कि कौन सच कह रहा है और कौन झूठ। निस्संदेह, ऐसी कार्रवाई से देश में बदले की राजनीति को ही प्रश्रय मिलेगा। जो स्वस्थ लोकतंत्र के हित में नहीं कहा जा सकता।

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