Tribune
PT
Subscribe To Print Edition About the Dainik Tribune Code Of Ethics Advertise with us Classifieds Download App
Grand Independence Day Sale
search-icon-img
Advertisement

इथेनॉल पर सवाल

बदलाव के लिए प्रामाणिक डेटा ज़रूरी

  • fb
  • twitter
  • whatsapp
  • whatsapp
Advertisement

पेट्रोलियम पदार्थों के विदेशों से आयात पर देश की अत्यधिक निर्भरता हमेशा गंभीर चिंता का विषय रही है। खासकर, हालिया पश्चिम एशिया संकट के दौरान हॉर्मूज खाड़ी में कच्चे तेल व गैस टैंकरों की आवाजाही पर रोक ने स्थिति की गंभीरता को दर्शाया। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा पेट्रोल को लेकर आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिये इसमें इथेनॉल मिलाने का विकल्प चुना। लेकिन आज इसके साइड इफेक्ट को लेकर देश में चिंता बनी हुई है। लोगों का आरोप है कि इससे वाहनों की माइलेज कम हुई है। कुछ की आशंका है कि गाड़ियों के रखरखाव की लागत बढ़ी है। दरअसल, इसकी वजह इथेनॉल के उपयोग को लेकर किसी प्रामाणिक अध्ययन का सामने न आना भी रहा है। ऐसे में अब जब केंद्र सरकार ने संसद में स्वीकार किया है कि उसने अभी तक ऐसा कोई आकलन नहीं किया है, जिससे पता चल सके कि देश में कितने वाहन ई-20 यानी अस्सी प्रतिशत पेट्रोल व बीस प्रतिशत इथेनॉल के अनुकूल हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। इससे यह बात साबित होती है कि देश के हरित ऊर्जा के लक्ष्यों और जमीनी स्तर की तैयारियों के बीच कितना अंतर है। ऐसे में वाहनों की प्रामाणिक गिनती या सर्वे के बिना देशव्यापी बदलाव के सफल होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? निस्संदेह ई-20 को बढ़ावा देने का उद्देश्य कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना है। साथ ही कार्बन उत्सर्जन घटाना और भारत की बायोफ्यूल वाली अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बनाना है। वहीं सरकार का कहना है कि बड़े पैमाने पर हुए अध्ययनों और फील्ड ट्रायल में यह वैकल्पिक ईंधन निर्धारित मानकों के तहत प्रयोग के लिये सुरक्षित पाया गया है। निस्संदेह, नियंत्रित स्थिति में हुए वैज्ञानिक परीक्षणों के परिणाम सकारात्मक हो सकते हैं। लेकिन जब लाखों वाहन चालकों को प्रभावित करने वाली किसी नीति का क्रियान्वयन किया जाता है तो जनता का विश्वास हासिल करने के लिये प्रामाणिक डेटा की भी जरूरत होती है।

बहरहाल, संसद में सरकार की स्वीकारोक्ति से इस नीति को लेकर विरोधाभास तो उजागर होता ही है। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ सालों से बीस करोड़ दुपहिया वाहनों और तीन करोड़ से ज्यादा पेट्रोल से चलने वाली कारों में इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी दलील है कि इसके बावजूद कोई बड़ी समस्या सामने नहीं आई है। हालांकि, सरकार की ओर से यह जानकारी नहीं दी गई है कि जिन वाहनों को लेकर वह दावा कर रही है, उसमें कितने वाहन ई-20 के लिये डिजाइन या प्रमाणित थे। ऐसी किसी बुनियादी जानकारी के बिना, सुरक्षा और परफॉर्मेंस के बारे में दिए गए भरोसे के शब्द शायद ही लोगों को विश्वास दिला पाएं कि इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उनके लिये लाभकारी है। हाल के दिनों में पूरे देश से इथेनॉल के मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रियाएं नजर आ रही हैं। मुद्दा सार्वजनिक विमर्श का विषय बना हुआ है। कुछ संगठन आंदोलन की चेतावनी भी दे रहे हैं। ट्रांसपोर्ट यूनियनों के विरोध, विपक्ष की इस मामले में पारदर्शिता की मांग और ‘ई-20 जनता पार्टी’ जैसे व्यंग्यात्मक ऑनलाइन कैंपेन लोगों की इस बाबत बढ़ती चिंता को ही दर्शाता है। ऐसे में सरकार को इस मुद्दे को समय रहते गंभीरता से लेने की जरूरत है। सही मायने में ग्राहकों को वारंटी सुरक्षा, लंबे समय तक रखरखाव के खर्च, इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की माइलेज और इंजन व अन्य उपकरण खराब होने की जिम्मेदारी के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलनी ही चाहिए। इस बाबत सरकार द्वारा दी गई केवल सफाई भरोसे का आधार नहीं बन सकती। इसके लिये प्रामाणिक तथ्यों की भी जरूरत है। वहीं सरकार के इस बाबत संकेत से कि ज्यादा इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल और फ्लेक्स-फ्यूल गाड़ियों के लिए प्रोडक्शन क्षमता बढ़ाई जा रही है,से यह पता जरूर चलता कि ई-20 आखिरी पड़ाव न हो। निश्चित रूप से इस तरह के किसी कदम के लिये जनता को विश्वास में लेने और डेटा आधारित पॉलिसी बनाने की जरूरत है। किसी नीति के लाभदायक होने के साथ ही जरूरी है लोगों को यह लगना कि उनकी चिंताओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

Advertisement

Advertisement
Advertisement
×