साख पर सवाल : The Dainik Tribune

साख पर सवाल

शीर्ष जांच एजेंसी की विश्वसनीयता पर संकट

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कुछ साल पहले की ही बात है कि देश की शीर्ष अदालत ने केंद्रीय जांच ब्यूरो की कारगुजारियों पर सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए आड़े हाथ लिया था। यहां तक कि उसे अपने मालिक की आवाज दोहराने वाले ‘पिंजरे के तोते’ की संज्ञा दी थी। मौजूदा दौर में सुप्रीम कोर्ट की यह गंभीर टिप्पणी हकीकत बनती नजर आने की बात कही जा रही है। एक आकलन के अनुसार, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो द्वारा विपक्षी राजनीतिक दलों के खिलाफ की जा रही जांच का आंकड़ा संप्रग सरकार के दौर के मुकाबले राजग सरकार के दौरान कहीं आगे निकल गया है। यद्यपि कांग्रेस का कार्यकाल कई दशक लंबा रहा है, लेकिन राजग के महज आठ वर्षों के कार्यकाल में ही यह वृद्धि देखी गई है। जिस दौर में कांग्रेस व उसके गठबंधन की सरकारें रहीं तो कुल 72 राजनीतिक नेताओं को सीबीआई जांच का सामना करना पड़ा था। जिसमें साठ फीसदी राजनेता विपक्ष से जुड़े हुए थे। वहीं दूसरी ओर वर्ष 2014 में सत्ता में आए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के महज आठ साल के कार्यकाल के दौरान अब तक कम से कम 124 प्रमुख राजनेता सीबीआई की जांच के दायरे में हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इन राजनेताओं में कुल 118 विपक्षी दलों से हैं। ऐसे में सवाल उठाये जा रहे हैं कि करीब 95 फीसदी विपक्षी राजनेता ही सीबीआई की जांच के रडार पर क्यों हैं? केंद्रीय सत्ता द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग का मुद्दा लगातार सार्वजनिक बहस में गाहे-बगाहे उठता रहता है। इसके बावजूद न तो सरकार पीछे हटती नजर आती है और न ही केंद्रीय जांच एजेंसी अपनी प्रतिष्ठा फिर हासिल करने के लिये प्रतिबद्ध नजर आती है। एक समय था कि जब किसी बड़े मामले की पुलिस और राज्यों की जांच एजेंसियों से जांच करवायी जाती थी तो एक सुर में मामले की तह तक जाने के लिये सीबीआई जांच की मांग पहले उठती थी। खासकर पेचीदा मामलों की तह तक जाने के लिये विश्वास था कि सीबीआई दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी।

निस्संदेह, हाल में सामने आये तथ्य इतने वास्तविक व तार्किक हैं कि सिर्फ विपक्षी दलों के खिलाफ मामले दर्ज होने को महज संयोग मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। इस मामले में जांच एजेंसी के एक अधिकारी का वह दावा असंगत लगता है कि सिर्फ विपक्षी दलों के बड़े राजनेताओं को ही निशाना नहीं बनाया जा रहा है। अध्ययन में हासिल आंकड़े तो कम से कम यही बताते हैं कि विपक्षी दलों के राजनेताओं को सत्तारूढ़ दल के राजनैतिक लक्ष्यों को साधने के लिये निशाने पर लिया जा रहा है। केंद्रीय एजेंसी की कारगुजारियों के चलते वह ही खुद सार्वजनिक जांच के दायरे में आ रही है। जिसकी बानगी पश्चिम बंगाल की विधानसभा में पारित प्रस्ताव में नजर आती है। पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस ने राज्य में केंद्रीय जांच एजेंसी की अति सक्रिय कारगुजारियों के खिलाफ यह प्रस्ताव पारित किया था। सदन में राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के भाजपा नेताओं पर सीबीआई व ईडी के साथ मिलकर अपनी योजनाओं को क्रियान्वित करने का आरोप लगाया था। बहरहाल, सवाल यह नहीं है कि राज्य में केंद्रीय जांच एजेंसी की अति सक्रियता राज्य के भाजपा नेताओं के इशारे पर हो रही है या केंद्र सरकार के दबाव में, महत्वपूर्ण यह है कि देश की बड़ी जांच एजेंसी का दुरुपयोग अस्वीकार्य है। जो इस राष्ट्रीय संस्था की बुनियाद को कमजोर करता है। कालांतर इससे देश का संवैधानिक व लोकतांत्रिक ढांचा भी कमजोर होता है। हाल के दिनों में कई राज्यों में विपक्षी दलों के राजनेता अपनी पार्टियां छोड़कर भाजपा में शामिल हुए हैं। कहा जा रहा है कि वे विभिन्न मामलों में जांच के भय से पाला बदल रहे हैं। माना जा रहा है कि यदि ये नेता इन प्रवृत्तियों का प्रतिकार करते तो केंद्रीय जांच एजेंसियों पर लगाम लगाने में न्यायपालिका महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती थी। निस्संदेह देश का जनमत भी सदैव भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कार्रवाई के पक्ष में रहता है। लेकिन राजनीतिक लाभों के लिये विपक्षी दलों के राजनेताओं को ही निशाना बनाना तार्किक नहीं हो सकता।

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