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जन्मदात्री की रक्षा

पंजाब-हरियाणा में मातृ-स्वास्थ्य को गंभीरता से लें

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हालांकि, पंजाब में पिछले दिनों सामने आए मातृ स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़े कुछ हद तक उम्मीद जरूर जगाते हैं, लेकिन उन्हें संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। राज्य में बच्चे को जन्म देने के दौरान मातृ मृत्यु दर में मामूली गिरावट दर्ज की गई है। जो निश्चित रूप से गर्भावस्था और प्रसव के दौरान माताओं की सेहत की सुरक्षा करने में स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की क्षमता में क्रमबद्ध सुधार का ही संकेत देती है। लेकिन, इस मामूली गिरावट के बावजूद एक गंभीर चिंता को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि प्रगति अभी भी धीमी व असमान गति वाली है। दरअसल, मातृ मृत्यु दर प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर होने वाली मौतों के रूप में मापी जाती है। जिसे व्यापक अर्थों में किसी भी समाज की स्वास्थ्य सेवा की क्षमता तथा समाज में लैंगिक समानता का एक महत्वपूर्ण सूचक भी माना जाता है। इस तरह मातृ मृत्यु दर में आई मामूली गिरावट भी प्रसव पूर्व गर्भवती स्त्री की देखभाल, संस्थागत स्तर पर प्रसव कराने और आपातकालीन प्रसूति सेवाओं की स्थिति में सुधार को ही दर्शाती है। इसके बावजूद अभी पंजाब में मातृ स्वास्थ्य सुविधाओं में विस्तार की काफी गुंजाइश है। विशेष रूप से तब जब कि कई जिलों में मातृ मृत्यु दर अभी भी चिंताजनक बनी हुई है। यहां जरूरी हो जाता है कि पंजाब के पड़ोसी राज्य हरियाणा में मातृ स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़े आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया जाए। हालांकि, पहले इस दिशा में आशातीत प्रगति दर्ज की गई थी। लेकिन अब हरियाणा की मातृ मृत्यु दर यानी एमएमआर के नवीनतम मूल्यांकन चक्र में स्थिति लगभग अपरिवर्तित ही नजर आती है। निश्चित तौर पर आंकड़ों में देखी जा रही यह स्थिरता सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति में एक आम चुनौती को ही उजागर करती है। निर्विवाद रूप से प्रारंभिक स्तर पर किए गए सुधार अक्सर त्वरित लाभ देते हैं, लेकिन जरूरी है कि इस दिशा में प्रगति को अनवरत बनाया रखा जाए। निस्संदेह, इस प्रगति के लिये निरंतर गहन संरचनात्मक परिवर्तनों की जरूरत होती है।

वास्तव में मातृ स्वास्थ्य रक्षा के लिये कई मोर्चों पर एक साथ काम करने की आवश्यकता होती है। ऐसे में केवल अस्पतालों और योजनाओं में निवेश करना ही पर्याप्त नहीं होता है। बल्कि गर्भावस्था के दौरान गुणवत्तापूर्ण देखभाल, समय रहते रेफरल और उच्च जोखिम वाली गर्भावस्थाओं की निरंतर निगरानी करना भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। दरअसल, पंजाब में स्वास्थ्य संबंधी ऑडिट से पहले ही प्रणालीगत खामियों की ओर संकेत मिला है। जैसा कि निदान में देरी, प्रसवोत्तर रक्तस्राव जैसी जटिलताओं का खराब प्रबंधन तथा स्वास्थ्य सुविधाओं के बीच कमजोर समन्वय का होना भी है। निस्संदेह, इन कमियों को दूर करने के लिये जिला अस्पतालों को सुविधा संपन्न करना बेहद जरूरी है। इसके अलावा अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की भी जरूरत है। साथ ही ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों से रेफरल नेटवर्क में यथाशीघ्र सुधार करना भी बेहद आवश्यक हो जाता है। भारत सरकार ने सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के क्रम में मातृ मृत्यु दर को प्रति एक लाख जीवित जन्मों पर 70 से कम करने का संकल्प लिया है। यदि पंजाब और हरियाणा को इस लक्ष्य को हासिल करना है तो उन्हें अपने प्रयासों में योजनाबद्ध ढंग से तेजी लानी होगी। इसमें दो राय नहीं कि मातृ मृत्यु दर महज चिकित्सा आंकड़े नहीं है। ये वो रोकी जा सकने वाली त्रासदी है, जो कई परिवारों और समुदायों को अपूरणीय क्षति पहुंचाती है। निर्विवाद रूप से इस दिशा में जहां शासन की ओर से सजगता व सतर्कता की आवश्यकता होती है, वहीं चिकित्सा तंत्र से इस दिशा में गहरी संवेदनशीलता की जरूरत होती है। निश्चित रूप से हमारे समाज में आमतौर पर श्रमिक व वंचित तबका ही सरकारी अस्पतालों का रुख करता है, जो महंगे अस्पतालों में अपनों का इलाज कराने में सक्षम नहीं होता है। वे वंश वृद्धि और मातृ रक्षा की आस में सरकारी अस्पतालों का रुख करते हैं। निस्संदेह, पर्याप्त सुविधा का अभाव व समय पर उपचार न मिलने से होने वाली हानि व्यवस्था पर भरोसे को कम ही करती है।

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