निजता की रक्षा

पेगासस मामले में कोर्ट की स्वतंत्र समिति

निजता की रक्षा

पेगासस जासूसी कांड पर सुनवाई करते हुए बुधवार को शीर्ष अदालत ने जांच के लिये स्वतंत्र कमेटी का गठन करके निजता और अभिव्यक्ति जैसे मौलिक अधिकारों की वकालत की है। अब इससे केंद्र सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ का कहना था कि यदि नियमों के विरुद्ध जासूसी हुई है तो अदालत मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकती। सरकार द्वारा गठित समिति को खारिज करके एक तरह सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को झटका दिया है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी समिति की जांच न्याय के लिये उचित नहीं होगी। कोर्ट ने निजता के अधिकार के अतिक्रमण को गंभीर मसला मानते हुए गठित कमेटी से आरोपों की विस्तृत जांच करके रिपोर्ट सौंपने को कहा है। कोर्ट का मानना था कि न्याय होना चाहिए और न्याय होता दिखना भी चाहिए। यही वजह है कि उपलब्ध लोगों में प्रतिष्ठित विशेषज्ञों को कमेटी में शामिल किया गया है। पेगासस की जासूसी से सीधे तरह प्रभावित याचिकाकर्ताओं की मांग पर सुनवाई करते हुए कोर्ट का कहना था कि निस्संदेह आज के युग में तकनीक महत्वपूर्ण है, लेकिन निजता के अधिकार की रक्षा जरूरी है। पत्रकार व विशिष्ट लोगों के लिये ही नहीं, वरन‍् आम लोगों के अधिकारों की भी। पिछले मानसून सत्र में पेगासस कांड को लेकर संसद में विपक्ष ने जोरदार हंगामा किया था, जिसके चलते पूरा मानसून सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ गया था। कोर्ट ने इस बात को लेकर भी नाराजगी जाहिर की कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इस मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने से मना किया था। केंद्र सरकार के रवैये से असंतुष्ट शीर्ष अदालत ने पूछा था कि क्या पेगासस जासूसी सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया गया था या नहीं। तब सरकार ने दलील थी कि यह मुद्दा सार्वजनिक रूप से चर्चा का नहीं है और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध है। इससे असहमत कोर्ट का कहना था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर निजता का अतिक्रमण नहीं किया जा सकता।

दरअसल, कोर्ट का मानना था कि यदि इस मामले में उठे सवालों के जवाब देने पर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा पैदा होता है तो सरकार इसे साबित भी करे। विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है कि पेगासस सॉफ्टवेयर को किसने खरीदा, इसे भारत कौन लेकर आया और इससे एकत्र डाटा क्या किसी अन्य देश के पास भी है? विपक्ष की ऐसी तमाम चिंताओं और प्रभावित लोगों की याचिका पर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने इस विशेषज्ञ कमेटी का गठन किया है। सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आर.वी. रवींद्रन की अध्यक्षता में गठित कमेटी में पूर्व आईपीएस अधिकारी आलोक जोशी, इंटरनेशनल ऑर्गेनाइजेशन ऑफ स्टैंडर्डाइजेशन सब-कमेटी के चेयरमैन डॉ. संदीप ओबेरॉय को शामिल किया गया है। इसके अतिरिक्त इस बाबत गठित तीन सदस्यीय तकनीकी कमेटी में साइबर सुरक्षा और डिजिटल फोरेंसिक के प्रोफेसर डॉ. नवीन कुमार चौधरी, इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. प्रभाकरन और कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर अश्विन अनिल गुमस्ते के नाम भी शामिल हैं। दरअसल, खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय समूह ने दावा किया था कि इस्राइली कंपनी एनएसओ के जासूसी सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिये दस देशों में करीब पचास हजार लोगों की जासूसी हुई थी, जिसमें तीन सौ भारतीयों के नाम होने का दावा किया गया था। आरोप था कि इन लोगों के फोन के जरिये निगरानी हुई है, जिसमें विपक्ष के नेताओं, केंद्र सरकार में शामिल मंत्री, पत्रकार, वकील, जज, कारोबारी, अधिकारी, वैज्ञानिक व एक्टिविस्टों के नाम शामिल थे। जिसके बाद विदेशी एंजेंसियों द्वारा भारतीयों की जासूसी के मामले को अदालत ने गंभीर मसला बताया था तथा सरकार की सफाई पर नाराजगी जाहिर की थी और कहा था कि ऐसे गंभीर मसले पर कोर्ट मूकदर्शक नहीं बना रह सकता। प्रधान न्यायाधीश एन.वी. रमण, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने विशेषज्ञ पैनल को जल्दी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने को कहा है। मामले को आगे की सुनवाई के लिये आठ सप्ताह बाद के लिये सूचीबद्ध किया गया है। कोर्ट का कहना था कि अदालत राजनीतिक निहितार्थों से इतर जनता के हित में संवैधानिक आकांक्षाओं और कानून के शासन को कायम रखने के लिये प्रतिबद्ध है क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में अधिनायकवादी प्रवृत्तियां स्वतंत्र एवं खुले समाज के हितों के लिये घातक साबित हो सकती हैं। 

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