गरीबी के आंकड़े

नीति-नियंताओं के लिए नयी कसौटी

गरीबी के आंकड़े

हाल ही में नीति आयोग की ओर से जारी हुई पहली मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स यानी एमपीआई रिपोर्ट जहां विकास की दौड़ में पिछड़ रहे बड़े राज्यों की हकीकत को दर्शाती है, वहीं उन राज्यों की उजली तस्वीर भी दिखाती है जिन्होंने गरीब उन्मूलन में काबिलेतारीफ कामयाबी पायी है। निस्संदेह सत्ताधीशों के लिये भी यह नसीहत ही है कि विकास के तमाम थोथे दावों के बावजूद हकीकत में तस्वीर क्यों नहीं बदल रही है। रिपोर्ट बताती है कि इक्यावन फीसदी गरीब आबादी के साथ बिहार इस सूची में अव्वल है तो .7 फीसदी गरीब आबादी वाले राज्य केरल ने गरीबी उन्मूलन की दिशा में सार्थक कामयाबी हासिल की है। जहां कुछ राज्यों ने आम लोगों के जीवन से जुड़ी मूलभूत आवश्यक सुविधाओं का लाभ जरूरतमंदों तक पहुंचाकर उनका जीवन उन्नत बनाने में सफलता हासिल की है, वहीं राजनीतिक रूप से जागरूक राज्यों में स्थिति खराब है। जो बताती है कि राजनीतिक विद्रूपता के चलते विकास योजनाओं का क्रियान्वयन बेहतर ढंग से नहीं हो पा रहा है। केरल के साथ ही गोवा, सिक्किम व तमिलनाडु की उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। लेकिन बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, व मेघालय की स्थिति चिंताजनक है। जो हमें सोचने के लिये विवश करती है कि विकास योजनाओं की घोषणाओं और प्रति व्यक्ति आय में इजाफे का असर लोगों के जीवन में बदलाव का वाहक क्यों नहीं बनती। जो इस बात की ओर भी इशारा करती है कि लोककल्याण योजना का क्रियान्वयन कितनी पारदर्शिता और कारगर ढंग से किया जा रहा है। सत्ताधीशों को सोचना होगा कि क्या ये योजनाएं व्यावहारिक धरातल में लोगों के जीवन में बदलाव की वाहक बन रही हैं? दरअसल, नीति आयोग की इस मल्टीडाइमेंशनल इंडेक्स रिपोर्ट में गरीबी की स्थिति का मूल्यांकन लोगों की सेहत, शिक्षा व जीवन स्तर के आधार पर किया गया है। निस्संदेह गरीबी मापने का यह तरीका परंपरागत गरीबी की रेखा से नीचे रहने वालों की स्थिति के पैमाने से भिन्न है, जिसमें कुल बारह दिशा सूचकों की मदद ली गई है।

निस्संदेह, नीति आयोग की ओर से जारी हुई पहली मल्टीडाइमेंशनल पॉवर्टी इंडेक्स इस पैमाने का प्रयोग वैश्विक स्तर पर जीवन स्तर वृद्धि मापने वाले विकास के लक्ष्यों के अनुरूप ही है। हो सकता है एनएफएचएस के पुराने आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट में नवीनतम आंकड़े शामिल करने के बाद स्थिति में कुछ बदलाव आये। लेकिन यह केंद्र व राज्य के नीति-नियंताओं के लिये आंख खोलने वाला भी है कि इन आंकड़ों के आधार पर अपनी रीतियों-नीतियों का मूल्यांकन करते हुए अपेक्षित सुधार करें। इस बात का मूल्यांकन भी जरूरी है कि सामान्य लोगों के जीवन में बदलाव लाने वाली योजनाओं का लाभ उन्हें भली-भांति मिल भी रहा है या नहीं। सुविधाओं की गुणवत्ता का स्तर क्या है। यदि किसी योजना के क्रियान्वयन में कोई खामी है तो उसमें सुधार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सभी सरकारों के कामकाज का मूल्यांकन ऐसी ही कसौटी पर किया जाना चाहिए। निस्संदेह ये बहुआयामी गरीबी सूचकांक राज्य सरकारों की भविष्य की नीतियां बनाने में सहायक साबित होंगे। यह भी एक तथ्य है कि बढ़ती आबादी भी गरीबी के मूल में है। बड़ी आबादी वाले राज्य बिहार, उत्तर प्रदेश व मध्य प्रदेश गरीबी के आंकड़े वाली सूची में पहले पांच राज्यों में शुमार हैं। कहने को इन तीनों राज्यों में डबल इंजन वाली सरकारें हैं, लेकिन ये राज्य गरीबी के दलदल से निकलने में असफल रहे हैं। जो विकास की विसंगतियों की ओर इशारा करता है कि विकास के दावों का प्रभाव यथार्थ में नजर नहीं आ रहा है। जरूरत इस बात की है कि लोकलुभावने नारों व कार्यक्रमों के बजाय जनता की मूलभूत अवश्यकताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाये। समाज में साक्षरता, परिवार नियोजन, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, स्वच्छता अभियान व स्वरोजगार जैसे अभियान पूरी क्षमता के साथ चलाने से स्थितियों में बदलाव आयेगा। नियोजित ढंग से शुरू की गई योजनाओं का असर जमीन पर भी दिखेगा और लोगों के जीवन में बदलाव भी आयेगा। यह बदलाव देश की तस्वीर बदलने में भी सहायक होगा। 

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